कोरोना में महिलाओं के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है “पी कोन”

पब्लिक प्लेसेज पर टॉयलेट अक्सर गंदे ही रहते हैं. पुरुष तो इसका इस्तेमाल खड़े-खड़े कर लेते हैं, लेकिन मुश्किल महिलाओं को होती है. बेहद मजबूरी में उन्हें उसी गंदे टॉयलेट पर बैठना पड़ता है, क्योंकि उनके सामने कोई और विकल्प नहीं होता है.
ऐसे में ”पी कोन” नामक प्रोडक्ट महिलाओं के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है. इससे न केवल हाइजीन मेंटेन रह सकती है, बल्कि कोरोना जैसे संकट से भी बचा जा सकता है. यूरिनल के लिए यह आविष्कार निश्चित रूप से एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है. इसकी और जानकारी आप इसकी वेबसाइट http://www.peecone.com से प्राप्त कर सकते हैं

कोरोना: नोएडा, ग्रेटर नोएडा की 1000 कंपनियों को नोटिस, 2 निजी स्कूलों की छुट्टी

कोरोना वायरस का प्रकोप विश्व भर में हर जगह जारी है। भारत में भी कई मामले सामने आने से हड़कंप-सा मचा हुआ है।
नोएडा के 2 निजी स्कूलों को इस क्रम में बंद कर दिया गया है।
साथ ही हेल्थ डिपार्टमेंट ने ग्रेटर नोएडा और नोएडा की 1000 कंपनियों को नोटिस देकर सावधानी बरतने को कहा है।

खासकर मल्टीनेशनल कंपनियां जहां पर फॉरेन डेलिगेट्स की आवाजाही लगी रहती है, उन्हें ज्यादा अगाह रहने को कहा गया है। बताते चलें कि दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल में एक ही परिवार के 6 लोगों में इस बीमारी के लक्षण मिले हैं और उन्हें आइसोलेशन वार्ड में रखा गया है।

इसी प्रकार मयूर विहार निवासी दिल्ली के एक मरीज में कोरोना की पुष्टि हुई थी, उसने 28 फरवरी की रात बच्चे के जन्मदिन की पार्टी दी थी और उसमें 25 लोग शामिल हुए थे। इसमें नोएडा के भी कुछ लोग थे और इसका खुलासा होने पर नोएडा के दो निजी स्कूल बंद कर दिए गए हैं। साथ ही पूरे स्कूल भवनों और बसों को सैनिटाइज किया जा रहा है।

आजम खान को प्रताड़ित करने पर भड़के शिवपाल यादव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खान का नाम हमेशा चर्चित रहा है। जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब उनके रुतबे में खासा इजाफा हुआ था और उन्हें एक कद्दावर नेता माना जाता था।

लेकिन जब से योगी सरकार सत्ता में आई है, उनके दिन उल्टे चल रहे हैं। हाल-फिलहाल वह जेल में बंद हैं और उत्तर प्रदेश सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि जेल में उनके साथ आतंकवादियों की तरह व्यवहार किया जा रहा है।

इसे लेकर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के अध्यक्ष शिवपाल यादव ने कहा कि उन पर छोटे-छोटे और झूठे मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
क्या आजम खान बकरी चुराएंगे?
क्या वह गाय चुराएंगे और क्या वह किताब चुराएंगे?
इसे लेकर प्रदेश सरकार पर शिवपाल यादव ने कड़ा निशाना साधा, साथ ही उनकी जेल में इधर से उधर शिफ्टिंग को लेकर भी प्रदेश सरकार का उत्पीड़न करार दिया।

दिल्ली हिंसा पर इस्लामिक कंट्रीज क्या कह रहे हैं?

पिछले दिनों दिल्ली में हुए बड़े दंगों ने सम्पूर्ण विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वैसे भी जब यह दंगे हुए, तब डॉनल्ड ट्रम्प अपनी भारत यात्रा पर थे और उनके साथ थी वैश्विक मीडिया।

मुस्लिम देशों के सबसे बड़े मंच इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने गुरुवार को दिल्ली हिंसा पर काफी सख्त रिएक्शन दिया है। ओआईसी ने माइनॉरिटीज को टारगेट करने का आरोप लगाते हुए वायलेंस की निंदा की है। इतना ही नहीं, ओआईसी ने #IndianMuslimsInDanger का हैशटैग भी इस्तेमाल किया। साथ ही इस संगठन ने भारतीय प्रशासन से मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा भड़काने और कांस्पीरेसी करने वाले लोगों को सजा दिलाकर न्याय सुनिश्चित करने की मांग की।

भारत ने ओआईसी के आरोपों पर तुरन्त ही जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा है कि ओआईसी का बयान तथ्यात्मक रूप से गलत, चुनिंदा और गुमराह करने वाला है। हकीकत यह है कि दिल्ली में हालात सामान्य करने और विश्वास का माहौल बनाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है।

रवीश कुमार ने आगे यह बी कहा कि भारत ऐसे संगठनों से अपील करता है कि इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान जारी ना करें।

अग्निधर्मी पत्रकार रामदहिन ओझा

18 फरवरी/बलिदान-दिवस

रामदहिन ओझा का जन्म श्री सूचित ओझा के घर 1901 की महाशिवरात्रि को ग्राम बाँसडीह (जिला बलिया, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं हुई। इसके बाद इनके पिता ने इन्हें उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता भेज दिया। वहाँ इनका सम्पर्क क्रान्तिकारियों से हुआ। इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में कूदना शिक्षा से अधिक जरूरी समझा।

1921 में जब गांधी जी ने सत्याग्रह का आह्नान किया, तो जो सात सत्याग्रही सर्वप्रथम जेल गये, उनमें ये भी थे। गांधी जी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में इनके साहस की प्रशंसा करते हुए इन्हें ‘सप्तर्षिमंडल’ की संज्ञा दी थी। इनकी गतिविधियों से चिंतित होकर 11 मार्च 1921 को बलिया के जिलाधीश ने इन्हें तुरन्त जिला छोड़ने का आदेश दिया। अतः ये गाजीपुर आकर स्वतन्त्रता के लिए अलख जगाने लगे। इस पर 15 अप्रैल को गाजीपुर के जिलाधीश ने भी इन्हें जिला छोड़ने को कह दिया। 16 मई, 1921 को इन्हें गिरफ्तार कर छह महीने का कठोर कारावास दिया गया। 30 जनवरी, 1922 को फिर इन्हें पकड़कर एक साल के लिए जेल में डाल दिया।

सजा पूरी कर वे कोलकाता चले गये और वहाँ ‘विश्वमित्र’ नामक दैनिक समाचार पत्र से जुड़ गये। कुछ समय बाद वे ‘युगान्तर’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक बने। इसके मुखपृष्ठ पर यह पंक्ति छपती थी – मुक्त हों हाथ, हथकड़ी टूटे, राष्ट्र का सिंहनाद घर-घर हो। इसी से पता लगता है कि समाचार पत्र में क्या होता होगा। इसके बाद वे ‘शेखावाटी’ समाचार पत्र के सम्पादक भी बने। वे जिस पत्र में भी रहे, उनकी कलम सदा अंग्रेजों के विरुद्ध आग ही उगलती रही।

युगान्तर में 4 अगस्त, 1924 को उन्होंने लिखा, ‘‘मालूम पड़ता है भारतीय सदा गुलाम ही रहना चाहते हैं। वह भी मामूली गुलाम नहीं। संसार के इतिहास में ऐसी गुलामी खोजे नहीं मिलेगी। पशु भी पिंजरे में बन्द रहने पर दो बूँद आँसू बहा सकते हैं; पर गुलाम भारतीय दिल खोलकर रो भी नहीं सकते।’’

इस पर शासन ने उन्हें कोलकाता छोड़ने का भी आदेश दे दिया। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। 1930 के नमक आन्दोलन में उन्होंने भाग लिया। शासन ने उन्हें बलिया से 27 अक्तूबर को गिरफ्तार कर छह माह के कठोर कारावास का दण्ड दिया। यह स्वाधीनता संग्राम में इनकी चौथी गिरफ्तारी थी; पर इससे भी झुकने या टूटने की बजाय इनका उत्साह और बढ़ गया।

शासन ने इन्हें रास्ते से हटाने का एक सरल मार्ग ढूँढा। इन्हें खाने में हल्का जहर दिया जाने लगा। इसके कारण 17 फरवरी, 1931 को इनकी तबियत बहुत खराब हो गयी। बलिया जेल के अधिकारियों ने बिना किसी पूर्व सूचना के उन्हें स्थानीय जमींदार महावीर प्रसाद के निवास पर पहुँचा दिया।

महादेव प्रसाद अपनी गाड़ी से उन्हें बलिया चिकित्सालय ले गये। वहाँ पर भी उन्हें उचित चिकित्सा नहीं मिली। इस पर उन्हें जानकी प्रसाद जी के आवास पर लाया गया। वहाँ रात भर तड़पने के बाद 18 फरवरी, 1931 की प्रातः उनका निधन हो गया। इस प्रकार उन्होंने केवल 30 साल की अल्पायु में ही बलिदानी चोला पहन लिया।

रामदहिन जी जैसे पत्रकारों के बारे में ही प्रख्यात पत्रकार बाबूराव विष्णु पराड़कर ने लिखा है, ‘‘वे ही सम्पादक थे, जिनसे धनी घृणा करते थे। शासक क्रुद्ध रहा करते थे। जो हमारे ही जैसा एक पैर जेल में रखकर धर्मबुद्धि से पत्र का सम्पादन किया करते थे।’’

सह्याद्रि का शेर ‘वासुदेव बलवंत फड़के’

17 फरवरी/बलिदान-दिवस

बात 1870 की है। एक युवक तेजी से अपने गाँव की ओर भागा जा रहा था। उसके मुँह से माँ-माँ….शब्द निकल रहे थे; पर दुर्भाग्य कि उसे माँ के दर्शन नहीं हो सके। उसका मन रो उठा। लानत है ऐसी नौकरी पर, जो उसे अपनी माँ के अन्तिम दर्शन के लिए भी छुट्टी न मिल सकी।

वह युवक था वासुदेव बलवन्त फड़के। लोगों के बहुत समझाने पर वह शान्त हुआ; पर माँ के वार्षिक श्राद्ध के समय फिर यही तमाशा हुआ और उसे अवकाश नहीं मिला। अब तो उनका मन विद्रोह कर उठा। उनका जन्म चार नवम्बर, 1845 को ग्राम शिरढोण (पुणे) में हुआ था। उनके पूर्वज शिवाजी की सेना में किलेदार थे; पर इन दिनों वे सब किले अंग्रेजों के अधीन थे।

छोटी अवस्था में ही वासुदेव का विवाह हो गया। शिक्षा पूर्णकर उन्हें सरकारी नौकरी मिल गयी; पर स्वाभिमानी होने के कारण वे कहीं लम्बे समय तक टिकते नहीं थे। महादेव गोविन्द रानडे तथा गणेश वासुदेव जोशी जैसे देशभक्तों के सम्पर्क में आकर फड़के ने ‘स्वदेशी’ का व्रत लिया और पुणे में जोशीले भाषण देने लगे।

1876-77 में महाराष्ट्र में भीषण अकाल और महामारी का प्रकोप हुआ। शासन की उदासी देखकर उनका मन व्यग्र हो उठा। अब शान्त बैठना असम्भव था। उन्होंने पुणे के युवकों को एकत्र किया और उन्हें सह्याद्रि की पहाड़ियों पर छापामार युद्ध का अभ्यास कराने लगे। हाथ में अन्न लेकर ये युवक दत्तात्रेय भगवान की मूर्ति के सम्मुख स्वतन्त्रता की प्रतिज्ञा लेते थे।

वासुदेव के कार्य की तथाकथित बड़े लोगों ने उपेक्षा की; पर पिछड़ी जाति के युवक उनके साथ समर्पित भाव से जुड़ गये। ये लोग पहले शिवाजी के दुर्गों के रक्षक होते थे; पर अब खाली होने के कारण चोरी-चकारी करने लगे थे। मजबूत टोली बन जाने के बाद फड़के एक दिन अचानक घर पहुँचे और पत्नी को अपने लक्ष्य के बारे में बताकर उससे सदा के लिए विदा ले ली।

स्वराज्य के लिए पहली आवश्यकता शस्त्रों की थी। अतः वासुदेव ने सेठों और जमीदारों के घर पर धावा मारकर धन लूट लिया। वे कहते थे कि हम डाकू नहीं हैं। जैसे ही स्वराज्य प्राप्त होगा, तुम्हें यह धन ब्याज सहित लौटा देंगे। कुछ समय में ही उनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी। लोग उन्हें शिवाजी का अवतार मानने लगे; पर इन गतिविधियों से शासन चौकन्ना हो गये। उसने मेजर डेनियल को फड़के को पकड़ने का काम सौंपा।

डेनियल ने फड़के को पकड़वाने वाले को 4,000 रु0 का पुरस्कार घोषित किया। अगले दिन फड़के ने उसका सिर काटने वाले को 5,000 रु0 देने की घोषणा की। एक बार पुलिस ने उन्हें जंगल में घेर लिया; पर वे बच निकले। अब वे आन्ध्र की ओर निकल गये। वहा भी उन्होंने लोगों को संगठित किया; पर डेनियल उनका पीछा करता रहा और अन्ततः वे पकड़ लिये गये।

उन्हें आजीवन कारावास की सजा देकर अदन भेज दिया गया। मातृभूमि की कुछ मिट्टी अपने साथ लेकर वे जहाज पर बैठ गये। जेल में अमानवीय उत्पीड़न के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। एक रात में वे दीवार फाँदकर भाग निकले; पर पुलिस ने उन्हेें फिर पकड़ लिया। अब उन पर भीषण अत्याचार होने लगे। उन्हें क्षय रोग हो गया; पर शासन ने दवा का प्रबन्ध नहीं किया।

17 फरवरी, 1883 को इस वीर ने शरीर छोड़ दिया। मृत्यु के समय उनके हाथ में एक पुड़िया मिली, जिसमें भारत भूमि की पावन मिट्टी थी।

फिल्मफेयर में ‘गली बॉय’ ने जमाया रंग

65वें ऐमजॉन फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में जोया अख्तर की ‘गली बॉय’ ने बेस्ट फिल्म समेत 10 अवार्ड झटक लिया, जबकि यह फिल्म तकरीबन 13 कटगरीज में नोमिनेट हुई थी। रणवीर सिंह और आलिया दोनों ने बेस्ट एक्टर इन लीडिंग रोल का पुरस्कार प्राप्त किया।
इस फिल्मफेयर में अक्षय कुमार, कार्तिक आर्यन इत्यादि कलाकारों ने अपनी परफॉरमेंस से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

बाकी पुरस्कार मिलने वाली सूची यहाँ है:

  • बेस्ट फिल्म क्रिटिक चॉइस: आर्टिकल 15
  • बेस्ट ऐक्टर क्रिटिक चॉइस: आयुष्मान खुराना, आर्टिकल 15
  • बेस्ट ऐक्ट्रेस क्रिटिक चॉइस: भूमि पेडनेकर और तापसी पन्नू (सांड की आंख)
  • बेस्ट लिरिक्स: अपना टाइम आएगा (डिवाइन और अंकुर तिवारी)
  • बेस्ट प्लेबैक सिंगर (मेल): कलंक नहीं (अरिजीत सिंह, कलंक)
  • बेस्ट प्लेबैक सिंगर(फीमेल): घूंघरू टूट गए (शिल्पा राव, वॉर)
  • बेस्ट ओरिजनल स्टोरी: अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी (आर्टिकल 15)
  • लाइफ टाइम अचीवमेंट्स अवॉर्ड: रमेश सिप्पी
  • यह भी पढ़ें: 65वांं ऐमजॉन फिल्‍मफेयर अवॉर्ड्स: लाइव
  • अवॉर्ड ऑफ एक्‍स‍िलेंस इन सिनेमा: गोविंदा
  • आरडी वर्मन अवॉर्ड फॉर अपकमिंग म्यूजिक टैलेंट: साश्‍वत सचदेव, (उरी, द सर्जिकल स्ट्राइक)
  • बेस्‍ट म्‍यूजिक एल्‍बम: ‘गली बॉय’ और ‘कबीर सिंह’
  • बेस्‍ट डेब्‍यू ऐस्‍टर (फीमेल): अनन्‍या पांडे (स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर 2)
  • बेस्‍ट डेब्‍यू ऐक्‍टर (मेल): अभिमन्यू दसानी (मर्द को दर्द नहीं होता)
  • बेस्‍ट डेब्‍यू डायरेक्टर: आदित्य धर (उरीः द सर्जिकल स्ट्राइक)
  • बेस्ट ऐक्टर सपॉर्टिंग रोल (मेल): सिद्धांत चतुर्वेदी (गली बॉय)
  • बेस्ट ऐक्टर सपॉर्टिंग रोल (फीमेल): अमृता सुभाष (गली बॉय)
  • बेस्ट स्क्रीनप्ले: रीमा कागती और जोया अख्तर (गली बॉय)
  • बेस्ट डायलॉग: विजय मौर्या (गली बॉय)
  • बेस्ट फिल्म पॉप्युलर: गली बॉय
  • बेस्ट डायरेक्टर: जोया अख्तर (गली बॉय)
  • बेस्ट ऐक्टर लीडिंग रोल (फीमेल)- आलिया भट्ट (गली बॉय)
  • बेस्ट ऐक्टर लीडिंग रोल (मेल)- रणवीर सिंह (गली बॉय)

पूर्वांचल के महान क्रान्तिवीर ‘शम्भुधन फूंगलो’

12 फरवरी/बलिदान-दिवस

भारत में सब ओर स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले वीर हुए हैं। ग्राम लंकर (उत्तर कछार, असम) में शम्भुधन फूंगलो का जन्म फागुन पूर्णिमा, 1850 ई0 में हुआ। डिमासा जाति की कासादीं इनकी माता तथा देप्रेन्दाओ फूंगलो पिता थे। शम्भुधन के पिता काम की तलाश में घूमते रहते थे। अन्ततः वे माहुर के पास सेमदिकर गाँव में बस गये। यहीं शम्भुधन का विवाह नासादी से हुआ।

शम्भु बचपन से ही शिवभक्त थे। एक बार वह दियूंग नदी के किनारे कई दिन तक ध्यानस्थ रहे। लोगों के शोर मचाने पर उन्होंने आँखें खोलीं और कहा कि मैं भगवान शिव के दर्शन करके ही लौटूँगा। इसके बाद तो दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आने लगे। वह उनकी समस्या सुनते और उन्हें जड़ी-बूटियों की दवा भी देते। उन दिनों पूर्वांचल में अंग्रेज अपनी जड़ें जमा रहे थे। शम्भुधन को इनसे बहुत घृणा थी। वह लोगों को दवा देने के साथ-साथ देश और धर्म पर आ रहे संकट से भी सावधान करते रहते थे। धीरे-धीरे उनके विचारों से प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ने लगी।

एक समय डिमासा काछारी एक सबल राज्य था। इसकी राजधानी डिमापुर थी। पहले अहोम राजाओं ने और फिर अंग्रेजों ने 1832 ई0 में इसे नष्ट कर दिया। उस समय तुलाराम सेनापति राजा थे। वे अंग्रेजों के प्रबल विरोधी थे। 1854 ई0 में उनका देहान्त हो गया। अब अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में फैले विद्रोह को दबाने के लिए राज्य को विभाजित कर दिया।

शम्भुधन ने इससे नाराज होकर एक क्रान्तिकारी दल बनाया और उसमें उत्साही युवाओं को भर्ती किया। माइबांग के रणचंडी देवी मंदिर में इन्हें शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस प्रकार प्रशिक्षित युवकों को उन्होंने उत्तर काछार जिले में सब ओर नियुक्त किया। इनकी गतिविधियों से अंग्रेजों की नाक में दम हो गया।

उस समय वहाँ अंग्रेज मेजर बोयाड नियुक्त था। वह बहुत क्रूर था। वह एक बार शम्भुधन को पकड़ने माइबांग गया; पर वहाँ युवकों की तैयारी देखकर डर गया। अब उसने जनवरी 1882 में पूरी तैयारी कर माइबांग शिविर पर हमला बोला; पर इधर क्रान्तिकारी भी तैयार थे। मेजर बोयाड और सैकड़ों सैनिक मारे गये। अब लोग शम्भु को ‘कमाण्डर’ और ‘वीर शम्भुधन’ कहने लगे।

शम्भुधन अब अंग्रेजों के शिविर एवं कार्यालयों पर हमले कर उन्हें नष्ट करने लगे। उनके आतंक से वे भागने लगे। उत्तर काछार जिले की मुक्ति के बाद उन्होंने दक्षिण काछार पर ध्यान लगाया और दारमिखाल ग्राम में शस्त्र निर्माण भी प्रारम्भ किया। कुछ समय बाद उन्होंने भुवन पहाड़ पर अपना मुख्यालय बनाया। यहाँ एक प्रसिद्ध गुफा और शिव मन्दिर भी है। उनकी पत्नी भी आन्दोलन में सहयोग करना चाहती थी। अतः वह इसके निकट ग्राम इग्रालिंग में रहने लगी। शम्भुधन कभी-कभी वहाँ भी जाने लगे।

इधर अंग्रेज उनके पीछे लगे थे। 12 फरवरी, 1883 को वह अपने घर में भोजन कर रहे थे, तो सैकड़ों अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। उस समय शम्भुधन निःशस्त्र थे। अतः वह जंगल की ओर भागे; पर एक सैनिक द्वारा फेंकी गयी खुखरी से उनका पाँव बुरी तरह घायल हो गया। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण वह गिर पड़े। उनके गिरते ही सैनिकों ने घेर कर उनका अन्त कर दिया। इस प्रकार केवल 33 वर्ष की छोटी आयु में वीर शम्भुधन ने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

राजा बख्तावर सिंह

10 फरवरी/बलिदान-दिवस

मध्य प्रदेश के धार जिले में विन्ध्य पर्वत की सुरम्य शृंखलाओं के बीच द्वापरकालीन ऐतिहासिक अझमेरा नगर बसा है। 1856 में यहाँ के राजा बख्तावरसिंह ने अंग्रेजों से खुला युद्ध किया; पर उनके आसपास के कुछ राजा अंग्रेजों से मिलकर चलने में ही अपनी भलाई समझते थे।

राजा ने इससे हताश न होते हुए तीन जुलाई, 1857 को भोपावर छावनी पर हमला कर उसे कब्जे में ले लिया। इससे घबराकर कैप्टेन हचिन्सन अपने परिवार सहित वेश बदलकर झाबुआ भाग गया। क्रान्तिकारियों ने उसका पीछा किया; पर झाबुआ के राजा ने उन्हें संरक्षण दे दिया। इससे उनकी जान बच गयी।

भोपावर से बख्तावर सिंह को पर्याप्त युद्ध सामग्री हाथ लगी। छावनी में आग लगाकर वे वापस लौट आये। उनकी वीरता की बात सुनकर धार के 400 युवक भी उनकी सेना में शामिल हो गये; पर अगस्त, 1857 में इन्दौर के राजा तुकोजीराव होल्कर के सहयोग से अंग्रेजों ने फिर भोपावर छावनी को अपने नियन्त्रण में ले लिया।

इससे नाराज होकर बख्तावर सिंह ने 10 अक्तूबर, 1857 को फिर से भोपावर पर हमला बोल दिया। इस बार राजगढ़ की सेना भी उनके साथ थी। तीन घंटे के संघर्ष के बाद सफलता एक बार फिर राजा बख्तावर सिंह को ही मिली। युद्ध सामग्री को कब्जे में कर उन्होंने सैन्य छावनी के सभी भवनों को ध्वस्त कर दिया।

ब्रिटिश सेना ने भोपावर छावनी के पास स्थित सरदारपुर में मोर्चा लगाया। जब राजा की सेना वापस लौट रही थी, तो ब्रिटिश तोपों ने उन पर गोले बरसाये; पर राजा ने अपने सब सैनिकों को एक ओर लगाकर सरदारपुर शहर में प्रवेश पा लिया। इससे घबराकर ब्रिटिश फौज हथियार फेंककर भाग गयी। लूट का सामान लेकर जब राजा अझमेरा पहुँचे, तो धार नरेश के मामा भीमराव भोंसले ने उनका भव्य स्वागत किया।

इसके बाद राजा ने मानपुर गुजरी की छावनी पर तीन ओर से हमलाकर उसे भी अपने अधिकार में ले लिया। 18 अक्तूबर को उन्होंने मंडलेश्वर छावनी पर हमला कर दिया। वहाँ तैनात कैप्टेन केण्टीज व जनरल क्लार्क महू भाग गये। राजा के बढ़ते उत्साह, साहस एवं सफलताओं से घबराकर अंग्रेजों ने एक बड़ी फौज के साथ 31 अक्तूबर, 1857 को धार के किले पर कब्जा कर लिया। नवम्बर में उन्होंने अझमेरा पर भी हमला किया।

बख्तावर सिंह का इतना आतंक था कि ब्रिटिश सैनिक बड़ी कठिनाई से इसके लिए तैयार हुए; पर इस बार राजा का भाग्य अच्छा नहीं था। तोपों से किले के दरवाजे तोड़कर अंग्रेज सेना नगर में घुस गयी। राजा अपने अंगरक्षकों के साथ धार की ओर निकल गये; पर बीच में ही उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर महू जेल में बन्द कर दिया गया और घोर यातनाएँ दीं। इसके बाद उन्हें इन्दौर लाया गया। राजा के सामने 21 दिसम्बर, 1857 को कामदार गुलाबराज पटवारी, मोहनलाल ठाकुर, भवानीसिंह सन्दला आदि उनके कई साथियों को फाँसी दे दी गयी; पर राजा विचलित नहीं हुए।

वकील चिमनलाल राम, सेवक मंशाराम तथा नमाजवाचक फकीर को काल कोठरी में बन्द कर दिया गया, जहाँ घोर शारीरिक एवं मानसिक यातनाएँ सहते हुए उन्होंने दम तोड़ा। अन्ततः 10 फरवरी, 1858 को इन्दौर के एम.टी.एच कम्पाउण्ड में देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले राजा बख्तावर सिंह को भी फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

इन्हीं बखत सिंह जी के लिए यह भी प्रसिद्ध है –

बखत-बखत बायरा क्यों मारेयो अजमाल।
हिन्दवाणी रो सेहरो तुरकाणी रो साल।।

आप नेता संजय सिंह ने EVM की सिक्यूरिटी पर सवाल किये , स्ट्रांग रूम पर नजर रखेंगे ‘आप’ कार्यकर्ता

चुनाव में पोल रिजल्ट आने के बाद आम आदमी पार्टी ईवीएम की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गयी है। उसके नेताओं ने कहा है कि 30 स्ट्रांग रूम के बाहर वह अपने कार्यकर्ताओं को तैनात करेगी जहां ईवीएम मशीनें रखी गई हैं।

गौरतलब है कि यह स्टेप मंगलवार को मतगणना वाले दिन तक मशीनों पर कड़ी निगरानी रखने के लिए उठाया गया है। बताया गया है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के नेताओं और अपने रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ बैठक की। इसके तुरंत बाद संजय सिंह ने बताया कि पार्टी के कार्यकर्ता पूरी राजधानी में स्ट्रांग रूम के बाहर मौजूद रहेंगे और नजर रखेंगे।