अमर बलिदानी छत्रपति सम्भाजी

भारत में हिन्दू धर्म की रक्षार्थ अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। छत्रपति शिवाजी के बड़े पुत्र सम्भाजी भी इस मणिमाला के एक गौरवपूर्ण मोती हैं। उनका जन्म 14 मई, 1657 को मां सोयराबाई की कोख से हुआ था। तीन अपै्रल, 1680 को शिवाजी के देहान्त के बाद सम्भाजी ने हिन्दवी साम्राज्य का भार सँभाला; पर दुर्भाग्य से वे अपने पिता की तरह दूरदर्शी नहीं थे। इस कारण उन्हें शिवाजी जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हुई। दूसरी ओर औरंगजेब सिर कुचले हुए नाग की भाँति अवसर की तलाश में रहता ही था।

संभाजी अपने वीर सैनिकों के बलपर औरंगजेब को सदा छकाते रहे। कभी उनका पलड़ा भारी रहता, तो कभी औरंगजेब का। घर के अंदर चलने वाली राजनीतिक उठापटक से भी संभाजी दुखी रहते थे। जिन दिनों वे अपने 500 सैनिकों के साथ संगमेश्वर में ठहरे थे, तब किसी मुखबिर की सूचना पर मुकर्रबखान ने 3,000 मुगल सेना के साथ उन्हें घेर लिया। संभाजी ने युद्ध करते हुए रायगढ़ की ओर जाने का निश्चय किया।

इस प्रयास में दोनों ओर के सैकड़ों सैनिक मारे गये। सम्भाजी के कुछ साथी तो निकल गये; पर संभाजी और उनके मित्र कवि कलश मुगलों के हत्थे चढ़ गये। औरंगजेब यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने संभाजी को अपमानित करते हुए अपने सामने लाने को कहा।

15 फरवरी, 1689 को दोनों को चीथड़े पहनाकर, ऊंट पर उल्टा बैठाकर औरंगजेब के सामने लाया गया। औरंगजेब उनका मनोबल तोड़कर हिन्दू शक्ति को सदा के लिए कुचलना चाहता था। अतः उसने सम्भाजी को कहा कि यदि तुम मुसलमान बन जाओ, तो तुम्हारा राज्य वापस कर दिया जाएगा और वहाँ से कोई कर नहीं लिया जाएगा।

पर सम्भाजी ने उसका प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि सिंह कभी सियारों की जूठन नहीं खाते। मैं हिन्दू हूँ और हिन्दू ही मरूँगा। औरंगजेब ने तिलमिला कर उन्हें यातनाएँ देना प्रारम्भ किया। उनके शरीर पर 200 किलो भार की जंजीरे बँधी थीं, फिर भी उन्हें पैदल चलाया गया। सम्भाजी कुछ कदम चलकर ही गिर जाते।

उन्हें कई दिन तक भूखा और प्यासा रखा गया। जंजीरों की रगड़ से सम्भाजी के शरीर पर हुए घावों पर नमक-मिर्च डाला गया। उनके शरीर को गर्म चिमटों से दागा गया। आँखों में गर्म कीलें डालकर उन्हें फोड़ दिया गया; पर उस सिंह पुरुष के मुँह से आह तक न निकली।

इससे चिढ़कर औरंगजेब ने 11 मार्च, 1689 (फागुन कृष्ण अमावस्या) का दिन उनकी हत्या के लिए निर्धारित किया। अगले दिन वर्ष प्रतिपदा (गुडी पाड़वा) का पर्व था। औरंगजेब इस दिन पूरे महाराष्ट्र को शोक में डुबो देना चाहता था।

11 मार्च की प्रातः दोनों को बहूकोरेगांव के बाजार में लाया गया। संभाजी से पूर्व उनके एक साथी कविकलश की जीभ और फिर सिर काटा गया। इसके बाद सम्भाजी के हाथ-पैर तोड़े गये और फिर उनका भी सिर धड़ से अलग कर दिया गया।

मुसलमान सैनिक सिर को भाले की नोक पर लेकर नाचने लगे। उन्होंने उस सिर का भी भरपूर अपमान कर उसे कूड़े में फंेक दिया। अगले दिन खंडोबल्लाल तथा कुछ अन्य वीर वेश बदलकर संभाजी के मस्तक को उठा लाये और उसका यथोचित क्रियाकर्म किया।

शिवाजी ने अपने जीवन कार्य से हिन्दुओं में जिस जागृति का संचार किया, संभाजी ने अपने बलिदान से उसे आगे बढ़ाया। अतः उनके छोटे भाई छत्रपति राजाराम के नेतृत्व में यह संघर्ष और तीव्र होता गया।

(संदर्भ : धर्मवीर संभाजी – प्र.ग.सहस्रबुद्धे)

नारी संगठन को समर्पित ‘सरस्वती ताई आप्टे’

9 मार्च/पुण्य-तिथि

1925 में हिन्दू संगठन के लिए डा. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य प्रारम्भ किया। संघ की शाखा में पुरुष वर्ग के लोग ही आते थे। उन स्वयंसेवक परिवारों की महिलाएँ एवं लड़कियाँ डा. हेडगेवार जी से कहती थीं कि हिन्दू संगठन के लिए नारी वर्ग का भी योगदान लिया जाना चाहिए।

डा. हेडगेवार भी यह चाहते तो थे; पर शाखा में लड़के एवं लड़कियाँ एक साथ खेलें, यह उन्हें व्यावहारिक नहीं लगता था। इसलिए वे चाहते थे कि यदि कोई महिला आगे बढ़कर नारी वर्ग के लिए अलग संगठन चलाये, तभी ठीक होगा। उनकी इच्छा पूरी हुई और 1936 में श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर (मौसी जी) ने ‘राष्ट्र सेविका समिति’ के नाम से अलग संगठन बनाया।

इस संगठन की कार्यप्रणाली लगभग संघ जैसी ही थी। आगे चलकर श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर समिति की प्रमुख संचालिका बनीं। 1938 में पहली बार ताई आप्टे की भेंट श्रीमती केलकर से हुई थी। इस भेंट में दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया। मौसी जी से मिलकर ताई आप्टे के जीवन का लक्ष्य निश्चित हो गया। दोनों ने मिलकर राष्ट्र सेविका समिति के काम को व्यापकता एवं एक मजबूत आधार प्रदान किया।

अगले 4-5 साल में ही महाराष्ट्र के प्रायः प्रत्येक जिले में समिति की शाखा खुल गयी। 1945 में समिति का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। ताई आप्टे की सादगी, संगठन क्षमता, कार्यशैली एवं वक्तृत्व कौशल को देखकर मौसी जी ने इस सम्मेलन में उन्हें प्रमुख कार्यवाहिका की जिम्मेदारी दी। जब तक शरीर में शक्ति रही, ताई आप्टे ने इसे भरपूर निभाया।

उन दिनों देश की स्थिति बहुत खतरनाक थी। कांग्रेस के नेता विभाजन के लिए मन बना चुके थे। वे जैसे भी हो सत्ता प्राप्त करना चाहते थे। देश में हर ओर मुस्लिम आतंक का नंगा खेल हो रहा था। इनकी शिकार प्रायः हिन्दू युवतियाँ ही होती थीं। देश का पश्चिमी एवं पूर्वी भाग इनसे सर्वाधिक प्रभावित था। आगे चलकर यही भाग पश्चिमी एवं पूर्वी पाकिस्तान बना।

आजादी एवं विभाजन की वेला से कुछ समय पूर्व सिन्ध के हैदराबाद नगर से एक सेविका जेठी देवानी का मार्मिक पत्र मौसी जी को मिला। वह इस कठिन परिस्थिति में उनसे सहयोग चाहती थी। वह समय बहुत खतरनाक था। महिलाओं के लिए प्रवास करना बहुत ही कठिन था; पर सेविका की पुकार पर मौसी जी चुप न रह सकीं। वे सारा कार्य ताई आप्टे को सौंपकर चल दीं। वहाँ उन्होंने सेविकाओं को अन्तिम समय तक डटे रहने और किसी भी कीमत पर अपने सतीत्व की रक्षा का सन्देश दिया।

1948 में गांधी जी की हत्या के झूठे आरोप में संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। हजारों कार्यकर्ता जेलों में ठूँस दिये गये। ऐसे में उन परिवारों में महिलाओं को धैर्य बँधाने का काम राष्ट्र सेविका समिति ने किया। 1962 में चीन के आक्रमण के समय समिति ने घर-घर जाकर पैसा एकत्र किया और उसे रक्षामन्त्री श्री चह्नाण को भंेट किया। 1965 में पाकिस्तानी आक्रमण के समय अनेक रेल स्टेशनों पर फौजी जवानों के लिए चाय एवं भोजन की व्यवस्था की।

सरस्वती ताई आप्टे इन सब कार्यों की सूत्रधार थीं। उन्होंने संगठन की लाखों सेविकाओं को यह सिखाया कि गृहस्थी के साथ भी देशसेवा कैसे की जा सकती है। 1909 में जन्मी ताई आप्टे ने सक्रिय जीवन बिताते हुए नौ मार्च, 1994 को प्रातः 4.30 बजे अन्तिम साँस ली।

इंटरनेशनल विमेन डे पर राष्ट्रपति ने महिलाओं को दिया ‘नारी शक्ति पुरस्कार’

आज विश्व भर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है।

इस मौके पर भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने महिलाओं को नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया है। इन महिलाओं में भारतीय वायुसेना की पहली महिला फाइटर पायलट मोहना जीतवाल, अवनी चतुर्वेदी और भावना कंठ जैसी महिलाएं शामिल हैं। इसी प्रकार एथलेटिक्स में 103 वर्षीय मान कौर को नारी शक्ति पुरस्कार मिला है, तो बिहार की बीना देवी को मशरूम की खेती को लोकप्रिय बनाने के लिए यह पुरस्कार दिया गया है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न क्षेत्रों में झंडे गाड़ने वाली महिलाओं को अपने सोशल मीडिया अकाउंट सौंपकर, अपने क्रिएटिव आईडिया से खासी चर्चा बटोरी है।

कोरोना पर जल्दी काबू नहीं पाया तो दुनिया की आधी आबादी चपेट में

कोरोना वायरस पर रिसर्च कर रहे ब्रिटेन के एक एक्सपर्ट रिचर्ड हैटचीट ने कहा है कि अगर कोरोना वायरस पर जल्दी ही काबू नहीं पाया गया तो दुनिया की आधी आबादी इस डरावनी बीमारी की चपेट में आ जाएगी।

रिचर्ड ने बताया कि यह एक ऐसी डरावनी बीमारी है जो पहले कभी नहीं देखी गई है और इसके लिए वैक्सीन तैयार करते समय ऐसा लग रहा है जैसे विश्वयुद्ध की तैयारी चल रही हो। बता दें कि ब्रिटेन में कोरोना वायरस से संक्रमित 164 मामले सामने आए हैं जिनमें 2 लोगों की अभी तक मौत हो चुकी है।

डॉक्टर रिचर्ड का कहना है कि चीन में शुरू हुआ कोरोना वायरस अब पूरी दुनिया में अपना पैर फैला चुका है ऐसे में सभी को एक साथ आकर इस महामारी से लड़ने की जरूरत है।

क्रान्तिकारी की मानव कवच ‘तोसिको बोस’

तोसिको बोस का नाम भारतीय क्रान्तिकारी इतिहास में अल्पज्ञात है। अपनी जन्मभूमि जापान में वे केवल 28 वर्ष तक ही जीवित रहीं। फिर भी सावित्री तुल्य इस सती नारी का भारतीय स्वाधीनता संग्राम को आगे बढ़ाने में अनुपम योगदान रहा।

रासबिहारी बोस महान क्रान्तिकारी थे। 23 दिसम्बर, 1912 को दिल्ली में तत्कालीन वायसराय के जुलूस पर बम फंेक कर उसे यमलोक पहुँचाने का प्रयास तो हुआ; पर वह पूर्णतः सफल नहीं हो पाया। उस योजना में रासबिहारी बोस की बड़ी भूमिका थी।

अतः अंग्रेज शासन ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए दूर-दूर तक जाल बिछा दिया। उन्हें पकड़वाने वाले के लिए एक लाख रु0 का पुरस्कार भी घोषित किया गया। यदि वे पकड़े जाते, तो मृत्युदण्ड मिलना निश्चित था। अतः सब साथियों के परामर्श से वे 1915 के मई मास में नाम और वेष बदलकर जापान चले गये।

उन दिनों जापान और ब्रिटेन में एक सन्धि थी, जिसके अन्तर्गत भारत का कोई अपराधी यदि जापान में छिपा हो, तो उसे लाकर भारत में मुकदमा चलाया जा सकता है; पर यदि वह जापान का नागरिक है, तो उसे नहीं लाया जा सकता था।

एक अन्य कानून के अनुसार पति-पत्नी में से कोई एक यदि जापानी है, तो दूसरे को स्वतः नागरिकता मिल जाती थी। इसलिए रासबिहारी के मित्रों ने विचार किया कि यदि उनका विवाह किसी जापानी कन्या से करा दिया जाये, तो प्रत्यार्पण का यह संकट टल जाएगा।

रासबिहारी बोस के एक जापानी मित्र आइजो सोमा और उनकी पत्नी कोक्को सोमा ने उन्हें अपने होटल से लगे घर में छिपाकर रखा। इस दौरान उनका परिचय सोमा दम्पति की 20 वर्षीय बेटी तोसिको से हुआ। उसे जब भारतीयों पर ब्रिटिष शासन द्वारा किये जा रहे अत्याचारों का पता लगा, तो उसका हृदय आन्दोलित हो उठा।

रासबिहारी ने उसे क्रान्तिकारियों द्वारा जान पर खेलकर किये जा रहे कार्यों की जानकारी दी। इससे उसके मन में आजादी के इन दीवानों के प्रति प्रेम जाग्रत हो गया। अन्ततः उसने स्वयं ही रासबिहारी बोस से विवाह कर उनकी मानव कवच बनने का निर्णय ले लिया। इतना ही नहीं, उसने अज्ञातवास में भी रासबिहारी का साथ देने का वचन दिया।

तोसिको के माता-पिता के लिए यह निर्णय स्तब्धकारी था, फिर भी उन्होंने बेटी की इच्छा का सम्मान किया। नौ जुलाई, 1918 को रासबिहारी बोस एवं तोसिको का विवाह गुपचुप रूप से सम्पन्न हो गया। इससे रासबिहारी को जापान की नागरिकता मिल गयी। अब वे खुलकर काम कर सकते थे।

उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाकर दक्षिण पूर्व एषिया में रह रहे भारतीयों को संगठित किया और वहाँ से साधन जुटाकर भारत में क्रान्तिकारियों के पास भेजे। उन्होंने आसन्न द्वितीय विष्व युद्ध के वातावरण का लाभ उठाकर आजाद हिन्द फौज के गठन में बड़ी भूमिका निभायी।

दो जुलाई, 1923 को रासबिहारी को जापान में रहते हुए सात वर्ष पूरे हो गये। इससे उन्हें स्वतन्त्र रूप से वहाँ की नागरिकता मिल गयी; पर इस गुप्त और अज्ञातवास के कष्टपूर्ण जीवन ने तोसिको को तपेदिक (टी.बी) का रोगी बना दिया। उन दिनों यह असाध्य रोग था। तोसिको मुक्त वातावरण में दो साल भी पति के साथ ठीक से नहीं बिता सकी। चार मार्च, 1925 को मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में वे इस संसार से विदा हो गयीं

1 अप्रैल से 31 सितंबर के बीच 31 सवालों के साथ होगी जनगणना

सेंट्रल गवर्नमेंट द्वारा 2021 की जनगणना के लिए कुल 31 सवाल तय किए गए हैं। जारी अधिसूचना के मुताबिक अबकी बार सरकार द्वारा घर में कमरों की संख्या, शौचालय, दीवार और छत की सामग्री इत्यादि सवाल शामिल किए जाएंगे।

इसके अतिरिक्त घर में रहने वाले लोगों की संख्या, मुखिया का नाम, जाति, मालिकाना हक के बारे में जानकारी, शादीशुदा लोगों के बारे में जानकारी, बिजली और पीने के पानी के बारे में इंफॉर्मेशन, रसोईघर, एलपीजी, पीएनजी गैस कनेक्शन की सिचुएशन, रेडियो, टीवी, इंटरनेट, मोबाइल, व्हीकल इत्यादि से जुड़े सवाल शामिल है। बताया जा रहा है कि परिवार के मुखिया का मोबाइल नंबर भी इस बार जनगणना में शामिल किया जाएगा।

जानकारी के अनुसार यह सारी चीजें राज्य को 45 दिनों के भीतर पूरा करना होगा।

स्वतन्त्रता सेनानी लाला हरदयाल

3 मार्च/पुण्य-तिथि

देश को स्वतन्त्र कराने की धुन में जिन्होंने अपनी और अपने परिवार की खुशियों को बलिदान कर दिया, ऐसे ही एक क्रान्तिकारी थे 14 अक्तूबर, 1884 को दिल्ली में जन्मे लाला हरदयाल। इनके पिता श्री गौरादयाल तथा माता श्रीमती भोलीरानी थीं। इन्होंने अपनी सभी परीक्षाएँ सदा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। बी.ए में तो उन्होंने पूरे प्रदेश में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था।

1905 में शासकीय छात्रवृत्ति पाकर ये आॅक्सफोर्ड जाकर पढ़ने लगे। उन दिनों लन्दन में श्यामजी कृष्ण वर्मा का ‘इंडिया हाउस’ भारतीय छात्रों का मिलन केन्द्र था। बंग-भंग के विरोध में हुए आन्दोलन के समय अंग्रेजों ने जो अत्याचार किये, उन्हें सुनकर हरदयाल जी बेचैन हो उठे। उन्होंने पढ़ाई अधूरी छोड़ दी और लन्दन आकर वर्मा जी के ‘सोशियोलोजिस्ट’ नामक मासिक पत्र में स्वतन्त्रता के पक्ष में लेख लिखने लगे।

पर उनका मन तो भारत आने को छटपटा रहा था। वे विवाहित थे और उनकी पत्नी सुन्दररानी भी उनके साथ विदेश गयी थी। भारत लौटकर 23 वर्षीय हरदयाल जी ने अपनी गर्भवती पत्नी से सदा के लिए विदा ले ली और अपना पूरा समय स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रयास में लगाने लगे। वे सरकारी विद्यालयों एवं न्यायालयों के बहिष्कार तथा स्वभाषा और स्वदेशी के प्रचार पर जोर देते थे। इससे पुलिस एवं प्रशासन उन्हें अपनी आँख का काँटा समझने लगे।

जिन दिनों वे पंजाब के अकाल पीडि़तों की सेवा में लगे थे, तब शासन ने उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। जब लाला लाजपतराय जी को यह पता लगा, तो उन्होंने हरदयाल जी को भारत छोड़ने का आदेश दिया। अतः वे फ्रान्स चले आये।

फ्रान्स में उन दिनों मादाम कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा सरदार सिंह राणा भारत की क्रान्तिकारी गतिविधियों को हर प्रकार से सहयोग देते थे। उन्होंने हरदयाल जी को सम्पादक बनाकर इटली के जेनेवा शहर से ‘वन्देमातरम्’ नामक अखबार निकाला। इसने विदेशों में बसे भारतीयों के बीच स्वतन्त्रता की अलख जगाने में बड़ी भूमिका निभायी।

1910 में वे सेनफ्रान्सिस्को (कैलिफोर्निया) में अध्यापक बन गये। दो साल बाद वे स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत तथा हिन्दू दर्शन के प्राध्यापक नियुक्त हुए; पर उनका मुख्य ध्येय क्रान्तिकारियों के लिए धन एवं शस्त्र की व्यवस्था करना था।

23 दिसम्बर, 1912 को लार्ड हार्डिंग पर दिल्ली में बम फंेका गया। उस काण्ड में हरदयाल जी को भी पकड़ लिया गया; पर वे जमानत देकर स्विटजरलैंड, जर्मनी और फिर स्वीडर चले गये। 1927 में लन्दन आकर उन्होंने हिन्दुत्व पर एक ग्रन्थ की रचना की।

अंग्रेज जानते थे कि भारत की अनेक क्रान्तिकारी घटनाओं के सूत्र उनसे जुड़ते हैं; पर वे उनके हाथ नहीं आ रहे थे। 1938 में शासन ने उन्हें भारत आने की अनुमति दी; पर हरदयाल जी इस षड्यन्त्र को समझ गये और वापस नहीं आये। अतः अंग्रेजों ने उन्हें वहीं धोखे से जहर दिलवा दिया, जिससे तीन मार्च, 1939 को फिलाडेल्फिया में उनका देहान्त हो गया।

इस प्रकार मातृभूमि को स्वतन्त्र देखने की अधूरी अभिलाषा लिये इस क्रान्तिवीर ने विदेश में ही प्राण त्याग दिये। वे अपनी उस प्रिय पुत्री का मुँह कभी नहीं देख पाये, जिसका जन्म उनके घर छोड़ने के कुछ समय बाद हुआ था।

‘मिरर लैंग्वेज’ में लिखी डॉ उत्तम दास की किताब “होली बाइबल” का प्रेस क्लब आफ इंडिया में हुआ लोकार्पण

मिरर लैंग्वेज में पूरी किताब लिखना अपने आप में अद्भुत है, और यह कार्य कर दिखाया है असम के डॉक्टर उत्तम दास ने। वहीं मिरर लैंग्वेज नामक टर्म का प्रचलन भी इन्हीं डॉक्टर उत्तम दास के माध्यम से हुआ है। जब आप इनके लिखावट को देखेंगे तो आपको यह उल्टी दिखाई देगी किंतु जब आप इसे मिरर में देखेंगे तो यह सीधी प्रतीत होगी।

डॉ उत्तम दास ने कई धर्म ग्रंथों को मिरर लैंग्वेज में लिखने का अभियान शुरू किया है, जिसमें से होली बाइबल न्यू टेस्टामेंट का उद्घाटन प्रेस क्लब आफ इंडिया में हुआ। जबकि गीता, कुरान इत्यादि पर वह कार्य कर रहे हैं।

अंग्रेजी में एक समूची बाइबिल को मिरर लैंग्वेज में लिखना अपने आप में अद्भुत बात है। इसी किताब ‘होली बाइबल’ का उद्घाटन जाने-माने साहित्यकार डॉ विनोद बब्बर एवं चित्र स्तंभकार ललित गर्ग के हाथों प्रेस क्लब आफ इंडिया में हुआ। इस ‘होली बाइबल’ का उद्घाटन करते हुए ‘राष्ट्र किंकर’ के नाम से सुविख्यात डॉक्टर विनोद बब्बर ने कहा कि हमेशा से कूट भाषा में संदेश लिखे जाते हैं लेकिन इतने बड़े पैमाने पर यह कार्य पहली बार डॉक्टर उत्तम दास ने किया है। ‘

डॉक्टर विनोद बब्बर ने अपने वक्तव्य में है कई सारी चुटीली बातों का जिक्र करते हुए कहा कि कई बार लोगों को सीधी बात समझ नहीं आती है इसीलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि तमाम धर्म ग्रंथों को वह उल्टी भाषा में ही सही समझेंगे।

इसी प्रकार ललित गर्ग ने डॉक्टर उत्तम दास को बधाई देते हुए अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ दास की प्रतिभा विशिष्ट है और इस बात के लिए उन्हें बधाई दी जानी चाहिए। अपने संबोधन में निलॉय भटाचार्य जो जाने-माने पत्रकार हैं उन्होंने बताया कि किस प्रकार 2005 में उन्होंने इस प्रतिभा को पहचाना था।

होली बाइबल के उद्घाटन के पश्चात सभागार में उपस्थित तमाम पत्रकारों ने डॉक्टर उत्तम दास से उनकी किताब के संदर्भ में कई प्रश्न पूछे और इस संदर्भ में उनकी बाइट्स भी रिकॉर्ड की। इस कार्यक्रम का आयोजन ‘लोकतंत्र की बुनियाद’ हिंदी मासिक पत्रिका के संपादक गणेश यादव ने किया जिसमें विभिन्न भाषाओं के अलग-अलग पत्रकार मौजूद थे।

दिल्ली हिंसा को लेकर Congress, TMC, CPM, CPI, NCP, DMK ने लोकसभा में कार्यस्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया

दिल्ली में हो रहे हंगामे और हिंसा को लेकर कांग्रेस सांसदों अधीर रंजन चौधरी एवं के सुरेश ने लोकसभा में कार्य स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा में कार्य स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है।