मध्य प्रदेश की हलचल बहुत कुछ कहती है!

पिछले दिनों मध्यप्रदेश में जो राजनीतिक उठापटक हुई उसने भारतीय जनता पार्टी की बांछें खिला दी है। प्रदेश नेतृत्व से लेकर बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व तक इस खुशी में झूम रहा है। इस ख़ुशी को लेकर वाजिब कारण है क्योंकि तमाम प्रदेशों में यह एक के बाद एक हार से केंद्र को लेकर भी भाजपा नेतृत्व सशंकित नजर आ रहा है। वहीं मध्य प्रदेश जैसे बड़े स्टेट में अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा मजबूत क्षत्रप उसकी पार्टी से आ मिलता है तो यह उसके लिए बड़ी राहत की बात है। यूं तो मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान बेहद लोकप्रिय रहे हैं लेकिन इस तमाम लोकप्रियता के बावजूद 2018 विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी।

बेशक यह 19 -20 के ही अंतर से था लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के क्षेत्र चंबल, ग्वालियर से लगभग सभी सीटें भाजपा के हाथ से निकल गयीं थी।

विशेषज्ञ बताते हैं कि आज के समय में भी सिंधिया परिवार का क्षेत्र में काफी दबदबा है और यह सब नजर आया जब ज्योतिरादित्य सिंधिया के एक इशारे पर 22 से अधिक कांग्रेस विधायकों ने एक झटके में इस्तीफा दे दिया। ना केवल विधायक बल्कि प्रदेश स्तर पर और जिला स्तर पर तमाम कार्यकर्ता नेता पार्टी छोड़ते नजर आए और कांग्रेस पार्टी के दफ्तर में इस्तीफा की झड़ी लग गई।

प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान तो इतने खुश हैं कि उनको समझ ही नहीं आ रहा है क्या बोलें और क्या ना बोले? भावुक होकर उन्होंने कांग्रेसी दिग्गज कमलनाथ की लंका जलाने की बात तो कही ही लेकिन साथ ही में उन्होंने ज्योतिरादित्य को भी विभीषण बता डाला।

अब यह बात उन्होंने अनजाने में कही है या फिर जानबूझकर यह एक चर्चा का विषय हो सकता है, लेकिन हर एक ट्वीट में हर एक संदेश में वह महाराज के साथ खड़े होने का दावा कर रहे हैं ताकि किसी भी हाल में वह सीएम पद की शपथ लें और पार्टी के भीतर से उनको चुनौती ना मिल सके। वैसे भी उन्हें नरोत्तम मिश्रा और नरेंद्र तोमर के नाम से थोड़ी बहुत ही सही लेकिन सुगबुगाहट जरूर मिल रही है। हालांकि केंद्रीय नेतृत्व के खुश होने के पीछे की वजह थोड़ी लंबी है। तमाम लोग कह रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को भारतीय जनता पार्टी में वह सम्मान नहीं मिलेगा जो उन्हें कांग्रेस में मिलता था।

पहले के भाजपा के संदर्भ में देखें तो यह बात एक तरफ से वाजिब लगती किंतु वर्तमान भाजपा थोड़ी अलग है विचारधारा के स्तर पर

अमित शाह ज्यादा परवाह नहीं करते हैं और हर एक उस व्यक्ति को वह पार्टी में शामिल करने की पुरजोर कोशिश करते हैं जो लोकसभा चुनाव में मददगार हो सके। रोजगार, अर्थव्यवस्था और दूसरे तमाम मोर्चों पर केंद्र से जनता की नाराजगी को भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व बखूबी भाप रहा है ऐसी स्थिति में 2024 के लिए तमाम मोहरे तैयार किए जा रहे हैं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया भी राज्य में भाजपा की सरकार बने इससे ज्यादा केंद्रीय नेतृत्व के लिए इस हेतु महत्वपूर्ण है कि लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश से भारी मात्रा में भाजपा को सीटें मिलने में रुकावट ना हो। भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान नेतृत्व में ज्योतिरादित्य सिंधिया का मामला हो चाहे नीतीश कुमार का उन लोगों को पर्याप्त सम्मान देना जिनके प्रभाव से लोकसभा चुनाव में उसे मदद मिल सकती है। और यही हमें मध्य प्रदेश में देखने को मिला है।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)

संपादकीय: यस बैंक क्यों बना ‘नो मनी बैंक’?

इकोनामी के धरातल में जाने की बात पहले ही कही जा रही थी। लोग-बाग के रोजगार पहले ही छिन रहे थे और अब यस बैंक में लोगों का पैसा फंस जाना तमाम रेगुलेटरीज के कार्य करने पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं।

बैंकों का बढ़ता एनपीए इस संस्था से लोगों का भरोसा डिगा सकता है, और यह कोई साधारण बात नहीं है।

यह समझना मुश्किल है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े पैमाने पर जंग छेड़ने की बात करने वाली मोदी सरकार पिछले 6 सालों में इन कमियों को भला कैसे पकड़ नहीं पाई?

आखिर बैंक कोई छोटी-मोटी चीज तो है नहीं कि उसका बही-खाता रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के पास नहीं पहुंचता हो! पहले पीएमसीबैंक और उसके बाद यस बैंक की इन बड़ी गड़बड़ियों को कंट्रोल से बाहर जाने देने का मतलब निश्चित रूप से यही है कि रेगुलेटरीज ठीक ढंग से काम नहीं कर पा रही हैं।

अगर लोग-बाग बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा करते हुए अपने पैसे बैंकों में जमा करते हैं तो उस पैसे की गारंटी सीधे तौर पर सरकार की ही है। सरकार के मातहत रिजर्व बैंक से लेकर तमाम जांच एजेंसियां कार्य करती हैं और यह गड़बड़ी क्यों बार-बार सामने आ रही है, इस बात का जवाब वित्त मंत्रालय को देना ही चाहिए। अब वर्तमान सरकार पिछली सरकार पर भी दोष नहीं मढ़ सकती है कि यह सब पहले से चला रहा था।

यूं यह मुमकिन है कि यह सब पहले से चला आ रहा हो, किंतु 6 साल में अगर पकड़ा नहीं गया तब यह बात अपने आप में चिंतनीय है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि यस बैंक का फाउंडर राणा कपूर मोदी नोमिक्स का प्रशंसक रहा है। नोटबंदी को उसने मास्टर स्टोक बताया था, लेकिन अब उस पर वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप लग रहे हैं। बताया तो यह भी जा रहा है कि वह जांच अधिकारियों को सहयोग नहीं कर रहा है, बल्कि प्रश्नों को टालमटोल कर रहा है। अगर ऐसा है तो राणा कपूर के राजनीतिक संबंधों की भी जांच पड़ताल करनी चाहिए, क्योंकि 6 साल से अगर वह बचा हुआ है तो यह कोई साधारण बात नहीं है।

सोचने वाली बात है कि जिन जमाधारकों का पैसा यस बैंक में फंसा हुआ है, उन पर क्या गुजर रही होगी?

हर किसी को किसी न किसी बात के लिए पैसे की जरूरत रहती ही है और ज़रुरत के समय पैसा डूबने का डर लोगों में अराजकता पैदा कर सकता है। हालांकि सरकार द्वारा एसबीआई के माध्यम से तुरंत ही यस बैंक का ऑपरेशन सामान्य करने की पहल जरूर की गई है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इस पर भी विशेषज्ञ अलग नजरिए से प्रश्न उठा रहे हैं।
बहरहाल यस बैंक के ‘नो मनी बैंक’ बनने से व्यवस्था पर बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हुआ है और इसकी जितनी जल्दी भरपाई की जाए, उतना ही बेहतर है।

– गणेश यादव
संपादक, लोकतंत्र की बुनियाद

मुसलमानों में ‘डर’ एक बयान से कैसे कम होगा?

हालांकि यह सकारात्मक बयान है और इसकी वर्तमान परिदृश्य में तारीफ की जानी चाहिए। संभवतः आप इस बयान से अवगत हो चुके होंगे और अगर नहीं हैं तो आपको बताते चलें कि केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मुसलमानों को भारत के जिगर का टुकड़ा कहते हुए सांप्रदायिक राजनीति को नकारने की बात की है। अपने एक साक्षात्कार में रक्षा मंत्री में साफ तौर पर यह बात कही है कि भारतीय जनता पार्टी सांप्रदायिक राजनीति नहीं करेगी।


राजनाथ सिंह वैसे भी उदार किस्म के नेता माने जाते हैं और यह उनके कई बयानों और कार्यों में परिलक्षित भी हुआ है, पर मुश्किल यह है कि उनकी बात का बाकी लोग कितना यकीन करते हैं खासकर के मुसलमान!

प्रश्न यह भी उठता है कि बाकी के भाजपा नेता राजनाथ सिंह के इस बयान का कितना मान रखते हैं? क्या वाकई भाजपा की संस्कृति यह मानती है जाहिर तौर पर इसमें काफी बड़ा गैप है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता जिसका जिक्र राजनाथ सिंह ने है आईएनएस से दिए गए इंटरव्यू में कहा है कि कुछ लोग संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति के कारण सांप्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं। लेकिन अगर इसका आकलन किया जाए तो खुद भारतीय जनता पार्टी की नीतियां इसमें लिप्त प्रतीत होंगी।


कहने को कहा जा सकता है और यह सच भी है कि कांग्रेस ने लंबे समय तक तुष्टिकरण की राजनीति की है जिसके परिणाम स्वरूप ध्रुवीकरण की राजनीति ने आजाद भारत में अपनी जड़ पकड़ी है। लेकिन वह तब की बात है जब कांग्रेस सत्ता में रहा करती थी और अब भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में है और देश भर में उसका एक बड़ा नेटवर्क बना है। प्रश्न उठता है कि क्या भाजपा के नेता डर का माहौल बनाकर अपनी राजनीति को जिंदा रखना चाहते हैं?

जरा सोचिए भाजपा के अधिकाधिक नेता किस तरह की बयानबाजी करते हैं?
दुर्भाग्य से भाजपा का इतिहास जिन दो वाक्यों के कारण जाना जाता है उनमें बाबरी मस्जिद का विध्वंस और गुजरात का 2002 दंगा शामिल है। 2002 दंगे के संदर्भ में वर्तमान प्रधानमंत्री और तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को कोर्ट द्वारा क्लीन चिट मिल चुकी है किंतु हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भारतीय मुस्लिमों का एक बड़ा तबका अभी भी उस वाक्य को भुला नहीं सका है। जिन मुसलमान को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जिगर का टुकड़ा कह रहे हैं उसी जिगर के टुकड़े में यह जख्म गहरे दबे हुए हैं।

सच क्या है झूठ क्या है? यह अलग बातें हैं लेकिन कम से कम उन जख्मों को कुरेदा नहीं जाना चाहिए। राष्ट्र के संबंध में जो भी हितकारी नीतियां आवश्यक हैं उन्हें अवश्य बनाया जाना चाहिए किंतु राजनीतिक रूप से सबको भरोसे में लेने की कवायद भी उतनी ही तीव्रता से करनी चाहिए।

आप चाहे कितनी भी अच्छी नीतियां बनाए किंतु अगर आप लोगों को भरोसे में नहीं लेते हैं तो अच्छी नीतियां गलत प्रभाव छोड़ती हैं। यह बात स्वयं सिद्ध है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को अपने बयान बेहद तोलमोल कर देना चाहिए और इस नीति का कहीं ना कहीं भाजपा के बड़े नेता और वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह ने उल्लंघन किया है। सी ए और एनआरसी को लेकर उनके बयानों ने बड़ा भ्रम फैलाया है।

हकीकत यह है कि इसी के परिणाम स्वरूप शाहीन बाग में आंदोलन हो रहा है और कई लोग अनावश्यक रोटी सेक रहे हैं। यह एक तथ्य है कि भारतीय आम मुसलमान वर्तमान सरकार को लेकर सशंकित है और उसमें भरोसा पैदा करने के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है। अगर वास्तव में मोदी सरकार 20 करोड़ के आसपास भारतीय मुसलमानों को मुख्यधारा में लाना चाहती है तो उनके डर को दूर किया जाना आवश्यक है। और राजनाथ सिंह का ‘जिगर का टुकड़ा’ मुसलमान वाला बयान इस संबंध में एक सार्थक बयान माना जा सकता है।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)

कई मायनों में खास रहा ‘डोनाल्ड ट्रंप’ का भारत दौरा

डोनाल्ड ट्रम्प के भारत दौरे के दौरान भले ही दोनों देशों के बीच कोई व्यापार समझौता नहीं हुआ, लेकिन ट्रंप का यह दौरा कई मायनों में बेहद खास है। दरअसल इस दौरे से दोनों देशों के संबंधों में और मजबूती आने की उम्मीद है। दोनों देशों के संबंध मजबूत होने के अलावा भी ट्रंप के इस दौरे से कई अहम बातें निकलकर सामने आयी हैं, भविष्य में जिनका फायदा दोनों देशों को मिल सकता है।

चिकित्सा उत्पादों की सुरक्षा के विषय पर भी भारत की सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन और अमेरिका की फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन के बीच सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए गए हैं। पेट्रोलियम और एलएनजी के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच परस्पर सहयोग बढ़ेगा।

इसके लिए इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और अमेरिका की एक्सान मोबिल इंडिया लिमिटेड और चार्ट इंडस्ट्रीज आईएनसी के बीच समझौता पत्र पर हस्ताक्षर हुए हैं।

3 बिलियन डॉलर की डील
इस दौरान भारत और अमेरिका के बीच 3 बिलियन डॉलर की डील हुई है। जिसमें भारत को 24 एमएच-60 हेलीकॉप्टर्स मिलेंगे। इसके साथ ही भारत को 6 अपाचे हेलीकॉप्टर्स भी मिलेंगे। भारत ने अमेरिका के साथ जिन 24 एमएच-60 हेलीकॉप्टर्स का सौदा किया है, उनकी मदद से भारतीय नौसेना हिंद महासागर में ज्यादा बेहतर तरीके से निगरानी कर सकेगी। अभी चीन द्वारा हिंद महासागर में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसके चलते चीन की नौकाओं पर भारतीय सीमा में प्रवेश करने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में नौसेना की निगरानी क्षमता में बढ़ोत्तरी होने से ऐसी घटनाओं में कमी आने की उम्मीद है।

वहीं इस दौरान भारत-अमेरिका पार्टनरशिप के महत्वपूर्ण पहलुओं डिफेंस, सुरक्षा, एनर्जी, टेक्नोलॉजी, ट्रेड जैसे सभी मसलों पर चर्चा हुई।

ट्रंप के दौरे की एक सबसे बड़ी सफलता अमेरिकी एनर्जी कंपनी एक्सान मोबिल कॉर्पोरेशन और इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन (IOC) के बीच की डील भी रही। दरअसल, देश के जिन शहरों में पाइपलाइन नहीं है, वहां कंटेनर के जरिए गैस पहुंचाने में भारत, अमेरिका की मदद लेने वाला है। इस पहल से देश में स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल में बढ़ोतरी होगी और दोनों देशों के बीच एनर्जी सेक्टर में सहयोग बढ़ेगा।

इसी तरह, मादक पदार्थो की तस्करी से जुड़े आतंकवाद और संगठित अपराध जैसी गंभीर समस्याओं के बारे में एक नए तंत्र पर भी सहमति बनी। जबकि कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद से निपटने में सहयोग करने को भी दोनों देश सहमत हुए।

रक्षा, सुरक्षा, ऊर्जा, कारोबार समेत कई अहम मुद्दों पर हुई बात
दोनों देशों की बातचीत वैसे तो रक्षा, सुरक्षा, ऊर्जा, कारोबार, तकनीकी हस्तांतरण से जुड़े द्विपक्षीय मुद्दों पर ही केंद्रित रही लेकिन स्थानीय वैश्विक मुद्दों को भी अच्छा खासा समय दिया गया। इसके तहत कश्मीर, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते वर्चस्व के खिलाफ संयुक्त रणनीति बनाने का मुद्दा भी प्रमुख रहा। दोनो नेताओं के सामने तीन समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। हालांकि ट्रेड समझौते को लेकर बहुत कुछ उल्लेखनीय तौर पर सामने नहीं आया। हां, यह निश्चित तौर पर सुनिश्चित हुआ कि आने वाले दिनों में भारत अपनी ऊर्जा व रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिका से और ज्यादा खरीददारी करेगा।

21वीं सदी की सबसे अहम साझेदारी
मोदी ने संयुक्त बयान में कहा कि ”भारत व अमेरिका के बीच साझेदारी 21 वीं सदी की सबसे अहम साझेदारी होगी। इसलिए मैने और राष्ट्रपति ट्रंप ने यह फैसला किया है कि इस साझेदारी को समग्र वैश्विक रणनीतिक साझेदारी में तब्दील किया जाएगा। अमेरिका के साथ हमारा रक्षा व सुरक्षा सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है। अमेरिका की बेहद आधुनिक रक्षा उपकरण हमारी क्षमता को और बढ़ाएंगी।” पीएम मोदी ने संकेतों में यह बताया कि उनकी बातचीत में चीन के साथ जुड़ी चुनौतियां भी रही हैं। ट्रंप की तरफ से सीएए का प्रश्न ही नहीं उठाया गया। हां धार्मिक आजादी का मुद्दा जरूर उठाया गया और मोदी की तरफ से उन्हें जो जवाब दिया गया उससे ट्रंप खासे संतुष्ट नजर आये।

मोदी मुस्लिमों के साथ मिल कर रहे काम: डोनाल्ड ट्रंप
ट्रंप ने कहा कि, ”धार्मिक स्वतंत्रता पर हमारी काफी बात हुई।

मैंने मुस्लिमों के साथ ईसाईयों की धार्मिक आजादी का मुद्दा भी उठाया है, पीएम मोदी इस बारे में काफी सशक्त तरीके से सोचते हैं। भारत ने धार्मिक आजादी के लिए लड़ाई लड़ी है और वह उसे बचा कर रखेगा। भारत में 20 करोड़ मुस्लिम हैं, कुछ साल पहले वो 14 करोड़ थे। मोदी मुस्लिमों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं।” ट्रंप ने आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ और सहयोग करने का आश्वासन दिया व कहा कि वह पाकिस्तान पर लगातार दबाव बना रहे हैं।

पाक का नाम लिए बगैर उन्होंने कहा कि आतंकवाद का साथ देने वाले देशों पर दबाव बनाने का काम और तेज होगा। उन्होंने कहा कि इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ भारत व अमेरिका का सहयोग और मजबूत होगा।

सीएए भारत का आतंरिक मामला: डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट तौर कहा है कि नागरिक संशोधन कानून (सीएए) भारत का आतंरिक मामला है और इसे किस तरह से डील करना है यह भारत पर निर्भर करता है।

ट्रेड डील पर भी बनेगी बात
दोनों देशों के बीच जल्द ही बड़े व्यापार समझौते की उम्मीद बन गई है। इसके लिए दोनों देश वार्ता करेंगे और आपसी सहमति के बाद इस संबंध में कोई बड़ा ऐलान किया जाएगा। चीन के साथ जारी व्यापार युद्ध के चलते अमेरिका किसी अन्य बड़े बाजार की तलाश में है। ऐसे में भारत के साथ व्यापार समझौता अमेरिका के लिए भी खासा फायदेमंद साबित होगा।
इसके बारे में बताते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने उम्मीद जतायी कि दोनों पक्ष इस दिशा में पहले एक सीमित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देंगे और इसका कानूनी रूप से जांच-पड़ताल जल्द पूरा कर लेंगे। गोयल ने कहा,‘हम उम्मीद करते हैं कि सीमित व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। इस पर चर्चा हो चुकी है और अंतिम रूप दिया जा चुका है। हम इसकी कानूनी रूप से जांच परख करेंगे और जल्दी ही इसे अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचाएंगे। इसके अलावा दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की दिशा में आगे बढ़ने का निर्णय किया है।

आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका और भारत
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2018-19 में भारत और अमेरिका के बीच 87।95 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। इसी तरह 2019-20 में अप्रैल से दिसंबर के दौरान भारत का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार 68 अरब डॉलर रहा। अमेरिका उन चुनिंदा देशों में से है, जिसके साथ व्यापार संतुलन का झुकाव भारत के पक्ष में है। यहां बता दें कि साल 2019 में भारत ने 239 अरब डॉलर के सरप्लस के साथ अमेरिका के 9वें सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार का अपना रुतबा बनाए रखा। दोनों देशों के इस व्यापार में कच्चे तेल की भूमिका सबसे अहम रही।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)

कितने करीब आएंगे भारत और अमेरिका?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा काफी सुर्खियां बटोर चुकी है। यूं तो डोनाल्ड ट्रंप पहले से ही भिन्न-भिन्न कारणों से पूरे विश्व में चर्चा के केंद्र में रहते हैं लेकिन हाल-फिलहाल भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनका तालमेल देखना दिलचस्प है। अमेरिका में हुए ‘हाउड़ी मोदी’ कार्यक्रम की तर्ज पर गुजरात के अहमदाबाद में ‘नमस्ते ट्रंप’ कार्यक्रम का आयोजन निश्चित रूप से दोनों नेताओं के कई लक्ष्यों को साधने वाला है। अमेरिकी राष्ट्रपति के संदर्भ से बात करें तो अमेरिका में होने वाले चुनाव में भारतीय समुदाय का सपोर्ट उनके लिए खासी अहमियत रखने वाला है। बताते चलें कि अमेरिका में भारतीय समुदाय का रुझान सामान्य रूप से डेमोक्रेट्स के खेमे में रहा है जबकि ट्रंप रिपब्लिकन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप भारतीय समुदाय को रिझाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने दे रहे हैं। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात करें तो घरेलू मोर्चे पर अर्थव्यवस्था को लेकर वह पहले से ही निशाने पर हैं साथ ही CAA जैसे कानूनों को लेकर शाहिनबाग सहित विभिन्न जगहों पर होने वाले प्रदर्शन उनके लिए सरदर्द बने हुए हैं। ऐसे में इस हाई प्रोफाइल कार्यक्रम और यात्रा को उनके लिए राहत की बात मानी जा सकती है। वैसे भी डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहकर नरेंद्र मोदी की तारीफ ही की है कि बेशक भारत में उनके साथ अच्छा नहीं किया लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को वह पसंद करते हैं।

बहर हाल अगर नेताओं के व्यक्तिगत फायदे की बात हम छोड़ दें तो भारत-अमेरिका के बीच दीर्घकालिक रिश्तो पर एक नजर डालना लाजमी हो जाता है। भारत की आजादी के बाद से देखें तो अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते सहज नहीं थे और तत्कालीन समय में द्विध्रुवीय विश्व में भारत कहीं ना कहीं सोवियत संघ के पक्ष में झुका हुआ था। परिस्थितियां बदली और सोवियत संघ का विघटन हुआ और विश्व एक ध्रुवीय ताकत अमेरिका के प्रभाव में आने को कहीं ना कहीं मजबूर हुआ। इधर चीन के उभार ने अमेरिका को भी भारत के साथ रिश्ते सहज करने को मजबूर किया और वह रिश्ते सहज भी हुए।

अटल बिहारी बाजपेई से लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी तक ने अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करने को एक बड़े अवसर की तरह लिया है और इसका देश को एक हद तक फायदा भी हुआ है। पर बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वाकई यह फायदा उतना हुआ है जितना होना चाहिए?

यह प्रश्न बेहद अहम है क्योंकि अमेरिका के साथ सहज रिश्ते के 2 दशक से अधिक हो चुके हैं और अब तो भारत अमेरिका संबंध मजबूत पार्टनरशिप के तौर पर भी देखा जा रहा है। किंतु अगर आप समग्र आकलन करते हैं तो हम आज भी एक विकासशील देश ही हैं और ना तो सैन्य क्षेत्र में और ना ही आर्थिक क्षेत्र में ना ही वैश्विक प्रभाव के क्षेत्र में हम अमेरिका के साथ संबंधों का फायदा ले पाए हैं। यह फायदा छुटपुट जरूर रहा है लेकिन आप ध्यान से देखेंगे तो समझ जाएंगे कि किसी भी मोर्चे पर अमेरिका हमें अपने पीछे तो रखना चाहता है लेकिन फायदा नहीं देना चाहता है। भारत यात्रा से ठीक पहले अमेरिका द्वारा यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है कि ट्रंप की यात्रा में अमेरिका फर्स्ट पालिसी को ही आगे रखा जाएगा।

ठीक बात भी है कोई भी देश अपने राष्ट्रीय हितों को ऊपर रखता है, पर मुश्किल तब हो जाती है जब वह हमें पिछलगू की तरह चलाना चाहे और जब लाभ देने की बात आए तो वह इधर उधर की बातें करने लगे!

अपने लिए तो वह उम्मीद करें कि उसके प्रोडक्ट भारत के बाजार में बगैर टैक्स के ही बिके लेकिन भारतीय प्रोफेशनल्स के जब अमेरिका में काम करने की बात आये तो वह सहूलियतों को बढ़ाने की बजाय खत्म करने लगे? वह यह तो चाहता है कि भारत रूस से मिसाइल रक्षा प्रणाली ना खरीदें लेकिन अपनी कोई महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी वह भारत को देने में पूरी तरह से परहेज भी करता है? वह यह तो चाहता है कि चीन को नियंत्रित करने में भारत उसकी नीतियों में सहायक बने लेकिन पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद में वह कोई सहायता नहीं करना चाहता, बल्कि ट्रंप तो भारत की इच्छा के विपरीत कई बार कश्मीर में मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं।

जाहिर है कि कई मुद्दे हैं जो उलझे हैं और उन उलझे मुद्दों को सुलझाना भारतीय नेतृत्व की काबिलियत होगी। हालांकि देशों के संबंध एक दिन में विकसित नहीं होते हैं और यह समय लेता है लेकिन सही पॉलिसी अडॉप्ट करना बेहद आवश्यक है। एक बात यह भी तय है कि जब तक आप मजबूत नहीं होते हैं तब तक आप दुनिया के किसी भी देश से किसी भी राष्ट्र अध्यक्ष से संबंध बना ले कोई खास फायदा नहीं होता है। बल्कि वह पीआर स्टंट की तरह रह जाता है। देखने वाली बात होगी कि अमेरिकी राष्ट्रपति की हाईप्रोफाइल यात्रा भारत की वास्तविक मजबूती में कितना योगदान करती है और दोनों देशों के दीर्घकालिक संबंधों को क्या दिशा देती है।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)

चीन में खतरनाक वायरस का फैलना कहीं खतरनाक प्रयोगों की श्रृंखला तो नहीं?

हालांकि इस तरह की आशंका व्यक्त करना ही सरसरी तौर पर उचित नहीं कहा जा सकता लेकिन जिस प्रकार का रहस्य सीन अपने आसपास निर्मित करता है उसमें यह बात असंभव भी नहीं लगती। दुनिया के तमाम देश जैविक हथियार रासायनिक हथियार पर अपनी खोज करते रहे हैं लेकिन चीन इस मामले में कहीं ज्यादा संदिग्ध रहा है। पिछले समय जिस प्रकार से सार्स फैमिली का वायरस फैला था और एंटीडोट्स से कंट्रोल किया गया था।

लेकिन अब कोरोनावायरस जो चीन के बाद 24 से अधिक देशों में फैल चुका है उसने बड़ी दहशत पैदा कर दी है। चीन के वहां शहर में इस बीमारी के सर्वाधिक लक्षण पाए गए हैं कहा जा रहा है कि वहां तमाम प्रयोगशाला है और सैन्य बेस है और बहुत मुमकिन है कि वहां जैविक हथियारों पर हो रहा कोई प्रयोग लीक हो गया है।

ज्ञात हो कि वहीं के हुबेई प्रांत में वुहान सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल (WHDC) लैब है। इस लैब में ऐसे जानवरों को रखा गया है जिनसे बीमारियां फैल सकती हैं। इस लैब में 605 चमगादड़ भी रखे गए थे। वहीं स्कॉलर बोताओ शाओ और ली शाओ का इस सन्दर्भ में कहना है कि 2019-CoV कोरोना वायरस की शुरुआत इसी लैब से हुई है।

वहीं इसके पक्ष में तमाम तर्क भी दिए जा रहे हैं कि अगर ऐसा नहीं होता तो चीन इस मामले के सामने आने के बाद तकरीबन 1 महीने तक इसे छुपाता नहीं। चीन के इस मामले को छिपाने का प्रयास तमाम देशों को महंगा पड़ गया है।

यहां तक कि भारत में भी केरल में 3 लोग कोरोना वायरस से ग्रसित पाए गए हैं। केरल राज्य सरकार ने इसे लेकर चेतावनी जारी की है। वहीं अमेरिका ने तो चीन से आने वाले यात्रियों पर अस्थाई तौर पर प्रतिबंध ही लगा दिया है। इतना ही नहीं चीन से अपने दूतावास के कर्मियों को भी अमेरिका ने वापस बुलाना शुरू कर दिया है।

इसे लेकर चीन विदेश मंत्रालय ने नाराजगी जाहिर की है किंतु उसकी नाराजगी से ज्यादा महत्वपूर्ण

यह बात है कि क्या वाकई दुनिया के तमाम देश जैविक हथियारों को लेकर प्रयोग जारी रखे हुए हैं? संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को इस बाबत अपना ध्यान जरूर देना चाहिए क्योंकि जैविक हथियार परमाणु हथियारों से कम घातक नहीं है!

परमाणु हथियार तो एक बार गिराए जाते हैं और अपना प्रभाव छोड़ कर चले जाते हैं किंतु जैविक हथियारों का डर अपने आप में बहुत बड़ा डर है। इसके अलावा कोरोनावायरस समस्या से जुड़ा यह वाकया भी महत्वपूर्ण है कि दुनिया के तमाम बड़े देशों में इसको लेकर तालमेल नजर नहीं आ रहा है। हमारा साइंस कितना भी आगे बढ़ गया हो किंतु है इस तरह की बीमारियों का हल ढूंढने में वह क्यों तत्कालिक रूप से प्रभावी नहीं हो पाता। इस बात पर भी दुनिया के तमाम रिसर्च की जरूरत है।

बचाव
WHO द्वारा जारी किये गए निर्देशों के अनुसार कोरोना वायरस से बचने के लिए आपको सी-फूड से दूर रहना होगा और कच्चे मांस तथा अध-पके मीट खाने से भी परहेज करना होगा।
इसके आलावा सर्दी -जुखाम और बुखार आने पर लापरवाही नहीं करें और तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)

पूरे दमख़म के बाद भी क्यों हार गयी बीजेपी?

बहुप्रतीक्षित दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे लगभग आ चुके हैं और आम आदमी पार्टी को इस चुनाव में जहां 62 सीटें मिली हैं वह पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ रही भारतीय जनता पार्टी मात्र 8 सीटों पर सिमट कर रह गई है। 15 साल तक लगातार दिल्ली पर शासन करने वाली कांग्रेस की बात करें तो पिछली बार की तरह कांग्रेस पार्टी इस बार भी चुनाव में खाता खोलने में असमर्थ रही।

इस चुनाव में जहाँ केजरीवाल वापसी की उम्मीद से चुनाव लड़ रहे थे, वहीं बीजेपी इस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए पूरे जी जान से लग गई थी और अपने सभी सांसद सभी विधायकों और मंत्रियों तक को दिल्ली की गलियों में उतार चुकी थी। यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तीन तीन सभाएं दिल्ली के विधानसभा चुनाव में की। इतनी मेहनत के बाद नतीजों की बात करें तो सिर्फ 8 सीटें कहीं ना कहीं सवाल खड़ा करती हैं बीजेपी के प्रदर्शन को लेकर। अगर हम परिणामों पर चर्चा करें कि बीजेपी बढ़िया प्रदर्शन क्यों नहीं कर पाई? तो इसमें सबसे बड़ी बात जो निकल कर आती हैं

CM फेस की कमी

पिछली बार की तरह इस बार भी बीजेपी दिल्ली में सीएम फेस के बिना ही चुनाव में उतरी थी और नरेंद्र मोदी के आधार पर दिल्ली चुनाव जीतने की मनसा रख रही थी। कहीं न कहीं बीजेपी के हार के लिए यह एक बड़ा रीजन है। दिल्ली वालों को पता ही नहीं था कि बीजेपी जीतती है तो मुख्यमंत्री किसे बनाया जाएगा? वहीं अरविंद केजरीवाल के रूप में उन्हें एक दमदार फेस दिख रहा था जो 5 साल तक उन्हें सर्विस देने के बाद अगले साल भी लोग उन पर विश्वास करने को तैयार थे। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि बिना सीएम फेस के चुनाव में उतरना बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।

बीजेपी का लास्ट मोमेंट में एक्टिव होना

आपने ध्यान दिया होगा कि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद दिल्ली की 4 लोकसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी की जमानत जब्त हो गई थी। एक तरफ जहां दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है और ऐसे में उसके चार उम्मीदवारों की जमानत जप्त हो जाए तो यह अपने आप में विचार करने का विषय था। और हुआ भी ऐसा ही अरविंद केजरीवाल ने इस हार से बहुत बड़ी सबक ली और उसी पल से विधानसभा चुनाव की तैयारी में लग गए। केजरीवाल ने अपने सभी कैडरको कैंपेनिंग पर लगा दिया कि ‘आएगा तो केजरीवाल ही’ उसका नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी लगभग 8 महीने से एक्टिव थी।

वहीं बीजेपी चुनाव घोषणा होने के बाद मैदान में उत्तरी और जो भी सामने आया उन मुद्दों को उठाती रही। वहीं अगर अमित शाह की बात करें तो उन्होंने चुनाव से 15 दिन पहले जरूर प्रचार का मोर्चा संभाला जिसका व्यापक असर भी देखने को मिला और आम आदमी पार्टी के माथे पर शिकन नजर आने लगी।

हालाँकि मात्र 15 दिन में किसी राज्य में चुनावी माहौल को बदलना बेहद मुश्किल काम होता है।

विकास के बदले विवादित राजनीति

एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल लगातार अपने किए हुए कार्य को चुनाव के दौरान मुद्दा बनाते रहे जिसमें दिल्ली में शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीब लोगों को दी गई फ्री सर्विस शामिल थे तो वही बीजेपी के पास बताने के लिए ऐसा कोई कार्य नहीं था। यहां तक कि बीजेपी आम आदमी पार्टी के कार्यकाल के दौरान कोई बड़ी कमी निकालने में भी पूरी तरीके से फेल हो गई। बीजेपी के हाथ कोई बड़ा मुद्दा नहीं लगा जिसके बदौलत वो दिल्ली में आम आदमी पार्टी की कमी को गिना सके।

बीजेपी के नेता जरूर कोशिश किए कि दिल्ली में राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जाए इसका कोई खास असर नहीं दिखा। बल्कि बीजेपी के बड़े नेताओं के द्वारा विवादित बयान बाजी से इसका फायदा सीधे-सीधे आम आदमी पार्टी को मिला।

अगर गौर करें तो पिछले तीन बार से नगरपालिका का चुनाव भारतीय जनता पार्टी जीत रही है। बावजूद इसके बीजेपी के पास अपने द्वारा किए गए कार्यों को गिनने के लिए कोई मुद्दा नहीं था। ऐसे में यह बेहद स्पष्ट हो गया है कि बदलते समय में पुराने ढर्रे पर चुनाव नहीं जीते सजा सकते। और बिना कार्य किए सिर्फ बयानबाजी के बदौलत अगर कोई पार्टी यह सोच रही है कि वह चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगी तो उसे दिल्ली के नतीजों पर एक नजर अवश्य डाल लेना चाहिए।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)

लोकतंत्र की जीत हुई

एक लंबे और थका अभियान के बाद अंततः दिल्ली चुनाव संपन्न हो गया है और तमाम कैंडिडेट्स की किस्मत ईवीएम मशीन में कैद हो गई है। कई एजेंसियों के सर्वे आ गए हैं और एक बड़े बहुमत से आम आदमी पार्टी सरकार बनाती दिख रही है। हालाँकि असली परिणाम क्या होगा यह 11 तारीख को होने वाली मतगणना में सामने आएगा। लेकिन एक बात तय है कि लोकतंत्र की जीत सुनिश्चित होने वाली है।

आखिर मतदान ही तो वह त्यौहार होते हैं जिसके फलस्वरूप लोगों को अपनी ताकत का एहसास होता है। राजतंत्र और लोकतंत्र में अगर अंतर की बात करें तो वह मतदान का दिन ही तो है जब जनता के अंदर कितनी ताकत है यह पता चलता है।

जब एक से बढ़कर एक बड़े लोग प्रभावशाली लोग और देश पर शासन करने वाले लोग जनता के सामने आकर हाथ जोड़ते हैं और उनसे गुजारिश करते हैं कि वह उन्हें वोट दें।

हालांकि पिछली बार की तुलना में इस बार दिल्ली में मतदान का प्रतिशत कम रहा लेकिन बावजूद इसके लोकतंत्र की जीत हुई है इस बात में कोई संदेह नहीं है। दिल्ली के चुनाव में मुख्य रूप से तीन पार्टियां आम आदमी पार्टी भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस मैदान में थीं। वहीं दो पार्टियों को ही मुकाबले में मान रहे थे जबकि कांग्रेस पार्टी संभवत उस ढंग से चुनाव नहीं लड़ी जिस ढंग से उसे चुनाव लड़ना चाहिए था। इसके पीछे कई आंतरिक राजनीतिक कारण हो सकते हैं। लेकिन वोटर्स के सामने तो स्थिति स्पष्ट थी। संभवत कांग्रेस को भी इसका अंदाजा हो गया था कि वोटर्स दो पार्टियों को लेकर ही सजग है। और इसी आकलन के फलस्वरूप वह ज्यादा प्रयास करती नजर नहीं आई।

भारतीय जनता पार्टी को लेकर अगर बात करें तो जिस प्रकार उसके तमाम राष्ट्रीय नेताओं ने दिल्ली चुनाव में ताकत झोंकी वह अपने आप में अभूतपूर्व थी।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी के गृह मंत्री अमित शाह अपने प्रत्येक चुनाव में जान फूंकने के लिए जाने जाते हैं लेकिन दिल्ली चुनाव में तो यह लोगों की आशाओं से भी अधिक प्रयास रहा। सैकड़ों सांसद तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्री दिल्ली के गली नुक्कड़ों पर नजर आए और लोगों से हाथ जोड़कर वोट मांगते दिखे।

इतना ही नहीं भाजपा द्वारा दिल्ली चुनाव में शाहीन बाग से लेकर कई मुद्दे उठाए गए और ध्रुवीकरण करने की एक जबरदस्त कोशिश हुई। देखना दिलचस्प होगा कि जनता ने भाजपा के इस प्रयास पर क्या रवैया अख्तियार किया है?

आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भी अपने 5 साल के किए कार्यों के आधार पर वोट मांगा और बीच में हनुमान जी की भक्ति समेत दूसरे मुद्दों को चुनावी नजरिए से भुनाने की कोशिश की। उनके प्रयासों का जनता पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी देखना दिलचस्प होगा।

सच कहा जाए तो वोटर्स को बेशक कोई मूर्ख माने लेकिन वह पंच परमेश्वर की तरह होता है। वोटिंग मशीन के सामने जाते ही वह उसी पंच परमेश्वर की भांति व्यवहार करता है जैसा मुंशी प्रेमचंद की कहानी में उद्धृत हुआ था। तमाम राग द्वेष से मुक्त होकर अभी भी भारतीय लोकतंत्र के मतदाता वोट करने को वरीयता देते हैं और संभवत इसी का परिणाम देखने को मिलेगा जो 11 फरवरी को मतगणना होने वाली है। आखिर यह लोकतंत्र की जीत नहीं तो और क्या है? उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में तमाम चुनाव में यह प्रयास लोकतंत्र को मजबूत करेंगे।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)

किस करवट बैठेगा दिल्ली चुनाव का ऊंट

दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने अपने तमाम घोड़े खोल दिए हैं। आम आदमी पार्टी अपने तमाम कार्यों और जनता को दी गयी फ्री कि सुविधाओं को लेकर चुनाव में भारी बहुमत के प्रति आश्वस्त है। तो बीजेपी ने अपना चिर परिचित हिंदू -मुसलमान का मुद्दा अपने तरकश से लगातार निकालना शुरू कर दिया है। अरविंद केजरीवाल और उनकी सदस्यों ने जहां सोशल मीडिया पर दबाकर प्रचार किया है।

वहीं भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता उसके सांसद और केंद्रीय मंत्री के साथ साथ प्रधानमंत्री तक अपने फुल फॉर्म में आ गए हैं। दिल्ली चुनाव की अपनी इंपोर्टेंस है और यह इंपोर्टेंस क्यों ना हो दिल्ली आखिर पूरे देश की राजधानी है और इसे एक मिनी इंडिया भी कहा जाता है। क्योंकि यहां पर देशभर से लोग आते हैं और बसते हैं।

जहां तक चुनावी नतीजों की बात की जाए तो निश्चित रूप से आम आदमी पार्टी ने एक बड़े तबके पर बिजली और पानी मुफ्त देने की योजनाओं के जरिए प्रभाव जमाया है। यह प्रभाव हल्का नहीं है और इसी के आधार पर उसके अपने आकलन है।

भारतीय जनता पार्टी पिछले दिनों कई राज्यों से सत्ता से बाहर हो गई है हाल ही में महाराष्ट्र और झारखंड इसके बड़े उदाहरण रहे हैं।

ऐसे में दिल्ली चुनाव अगर वह बड़े अंतर से हार जाती है तो यह कहीं ना कहीं प्रधानमंत्री की नीतियों पर एक जनादेश के तौर पर भी लिया जाएगा। इसीलिए दिल्ली चुनाव में वह न केवल अपने बड़े नेताओं को उतार रही है बल्कि बिहार जैसे राज्यों से नीतीश कुमार जैसे सहयोगी को भी मैदान में खड़ा कर चुकी है। उसके अपने फायर ब्रांड नेता भी फुल मूड में है। दिल्ली चुनाव की भाजपा के लिए क्या अहमियत है इसी बात से समझा जा सकता है कि सामान्य तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में हिंदू मुस्लिम के मुद्दों का जिक्र नहीं करते हैं।

किंतु इस बार वह भी शाहीन बाग के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं। चुनाव में जीत हार चाहे जिसकी हो लेकिन आने वाली 8 फरवरी को भारी संख्या में दिल्लीवासी मतदान करेंगे इसे लेकर चुनाव आयोग किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ रहा है। इसके लिए तमाम अभियान बहुत पहले से चलाए जा रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि इस बार दिल्ली चुनाव में 70% से अधिक मतदान होगा।

लोकतंत्र की खूबसूरती भी तो यही है कि जीते हारे कोई भी किंतु लोकतंत्र के इस पर्व में सबकी भागीदारी समान होनी चाहिए।

बता दें कि इस चुनाव के साथ केजरीवाल अपनी दूसरी पारी शुरू करेंगे तो बीजेपी ने भी तक आने मुख्यमंत्री के चहरे का खुलासा नहीं किया है। वहीं दिल्ली में 8 फरवरी को चुनाव संपन्न होंगे और परिणामों की घोषणा 11 फ़रवरी को किये जायेंगे।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)

उम्मीद की नैय्या पर सवार बजट 2020

देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पर सबसे लंबा भाषण देकर रिकॉर्ड तो जरूर बना दिया है लेकिन बजट पर उनके भाषण जितनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं नहीं मिली है। शेयर बाजार और तमाम विशेषज्ञ इस बजट पर उस तरीके से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर रहे हैं जैसी सरकारी नीति निर्धारकों को उम्मीद रही होगी।

वैसे उम्मीद की बात ना ही की जाए तो बेहतर रहेगा क्योंकि उम्मीद पर बेशक दुनिया कायम हो लेकिन भारत का उद्योग जगत और युवाओं का रोजगार और इस पर आश्रित उम्मीदें एक के बाद एक करके घट गई हैं। कुछ लोग इस बजट को रोजगार परक जरूर मान रहे हैं लेकिन अधिकांश लोग इसे उम्मीदों से कम ही बता रहे हैं।

इनकम टैक्स के मुद्दे पर दो ऑप्शन देकर वित्त मंत्री ने जादूगरी करने की ही कोशिश की है हालांकि इस जादूगरी से किस का कल्याण होगा यह कहना और समझना मुश्किल है।

नरेंद्र मोदी सरकार को यह बात भलीभांति समझ लेना चाहिए कि बिना विशेषज्ञों की टीम के सिर्फ भाषण बाजी और राष्ट्रवाद का नारा लगाने वाले लोग अर्थव्यवस्था की हालत दुरुस्त नहीं कर सकते। हालांकि बजट पेश करने के तुरंत ही बाद देश के शीर्ष उद्योगपतियों से मीटिंग करके नरेंद्र मोदी ने एक संवाद शुरू करने की पहल जरूर की है।

इन उद्योगपतियों में मुकेश अंबानी से लेकर रतन टाटा और गौतम अडानी से लेकर आनंद महिंद्रा तक शामिल रहे हैं। हालांकि इन उद्योगपतियों की सकारात्मक सलाह पर अमल कितना होगा यह देखने वाली बात होगी। अब तक यही देखा गया है कि केंद्र सरकार बेशक सुनती सबकी हो लेकिन करती अपनी ही है। अगर ऐसा नहीं होता तो भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर जहाँ विश्व को दिशा दे सकने की क्षमता व्यक्त की जा रही थी वह औंधेमुँह गिर रही है।

गिरते बजट के कुछ सार्थक और कुछ निरर्थक पैमानों की बात करें तो मोदी सरकार के पहले शासनकाल में हुए नोटबंदी और जीएसटी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए एमएसएमई सेक्टर को गति देने के लिए इस बजट में कोशिश की गयी हैं जिसके अंतर्गत इन कंपनियों के ऑडिट के लिए इनके टर्नओवर की सीमा को 1 करोड़ रुपये से बढ़ा कर 5 करोड़ कर दिया है।

बता दें कि देश में सबसे अधिक रोजगार देने यही सेक्टर देता हैं। वहीं इन सुक्ष्म, छोटे व मझोले इंडस्ट्रीज़ की इकोनॉमिक कंडीशन सुधारने के लिए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने फैक्टर रेगुलेशन एक्ट में संशोधन की घोषण भी की हैं।


5 लाख की रकम तक कमाई इनकम टैक्स के दायरे से बाहर रहने से मिडिलक्लास को फायदा जरूर पहुंचेगा तो बहुत सारे अप्रचलित टैक्स छूट वाले 70 विकल्पों को सरकार ने वापस लेने का फैसला किया हैं जो की बढियाँ कदम है।वहीं हम बायकोन की चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक किरण मजूमदार शॉ की बात करें तो उन्होंने इस बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि बजट 2020 से मजबूत आर्थिक सुधार की उम्मीद बेहद कम है। वहीं इस बजट में स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा पर बजट आवंटन में कटौती भी निराश करती है।

कुल मिलाकर जिन परिस्थितियों में यह बजट तैयार किया गया है इसमें बहुत अधिक करने की गुंजाइस ही कम थी।

– गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)