PM नरेंद्र मोदी को राहुल गाँधी का चैलेन्ज

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर आज कांग्रेस के द्वारा बुलाई गई विपक्षी दलों की मीटिंग के बाद राहुल गांधी ने जमकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज देते हुए कहा कि अगर उनमें दम है तो वह देश की किसी भी यूनिवर्सिटी में बिना सिक्योरिटी के जाएं।

इतना ही नहीं राहुल गाँधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के युवाओं से बात करनी चाहिए ना कि उनकी आवाज को दबाने की कोशिश करनी चाहिए। आज का युवा जाग गया है और उसको भटकाना मुश्किल है। प्रधानमंत्री मोदी को छात्रों के बीच खड़े होकर यह जवाब देना चाहिए कि देश की अर्थव्यवस्था किस प्रकार पटरी पर आएगी और कैसे भारत में युवाओं को रोजगार मिलेंगे?


बता दें कि इस दौरान मीडिया ने जब उनसे इस मीटिंग में तमाम बड़े विपक्षी नेताओं के ना आने का कारण पूछा तो राहुल गांधी ने इस सवाल को टाल दिया।

कौन थे चकमा और हजोंग शरणार्थी जिन्हें भारत ने अपनी नागरिकता दिया

यह 1964- 65 की बात है जब चकमा और हजोंग जनजातियां भारत में आकर शरण लेना शुरू कर चुकी थी। ये जनजातियां चटगांव पहाड़ी इलाकों की रहने वाली है, यह क्षेत्र मुख्य रूप से पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच पड़ता है। यह क्षेत्र पहले पाकिस्तान में था हालांकि बंटवारे के बाद बांग्लादेश का हिस्सा है। चकमा जनजाति की बात करें तो यह बौद्ध धर्म को मानने वाले जनजाति है तो हजोंग हिंदू धर्म को मानने वाले जनजाती है।

ज्ञात हो कि इन जनजातियों का अपने देश में शोषण होता था जिसके चलते यह जातियां सुरक्षित स्थान की तलाश में भारत में आकर बसना शुरू कर दीं। हालाँकि इनके विस्थापन की प्रमुख कारणों को यह भी माना जाता है कि 1965 के दौरान बांग्लादेश का कप्ताई बांध टूट गया था जिसके चलते इन जनजातियों के इलाके में पानी भर गया था।

ऐसे में इनका घर बार सब डूब चुका था और इनके पास नहीं रहने के लिए घर और खाने के लिए अनाज नहीं था और यह जनजातियां तब भारत का रुख कर दी। अगर भारत की बात करें तो हजोंग जनजाति भारत के पूर्वोत्तर राज्य, पश्चिम बंगाल और म्यांमार में भी पाई जाती है।

अपने शुरुआती दिनों में यह जनजातियां असम क्षेत्रों में घुसपैठ करके बसने लग गई थी। दोनों जनजातियों के आकर बसने की वजह से वहां के स्थानीय लोगों और इन जनजातियों में टकराव शुरू हो गया जिसके चलते सरकार ने इन्हें अरुणाचल प्रदेश की तरफ शिफ्ट कर दिया। इसके बावजूद कुछ लोग फिर भी असम में ही रुक गए थे।

हालांकि अरुणाचल प्रदेश में भी इन को स्वीकार नहीं किया गया और नए-नए बसे अरुणाचल प्रदेश ने इनका विरोध शुरू कर दिया। हिमाचल प्रदेश सरकार का कहना था कि हमारे प्रदेश में जनता प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है और यह प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में हैं।

ऐसे में बाहरी लोगों के आने से यहां के स्थानीय निवासियों के ऊपर बोझ बढ़ेगा। उस समय तक अरुणाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला था और वह प्रशासन के द्वारा ही चलाया जाता था। ऐसे में हिमाचल प्रदेश के कुछ छात्र संगठनों ने इन जनजातियों के खिलाफ आंदोलन की आग को खूब हवा दी। 1987 में जब अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ तब यह आंदोलन और बड़ा रूप ले चुका था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन जनजाति के लोगों को भारत की नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवेदन के आदेश जारी कर दिए थे।

बावजूद इसके अब तक इन्हे भारत की नागरिकता नहीं मिली थी। उनके संघर्ष की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, इन जनजाति के लोगो को भारत की नागरिकता नहीं मिलने के कारण नौकरी और शिक्षा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी बेहद संघर्ष करना पड़ता था। हालांकि सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले में कुछ जमीन जरूर आवंटित की गई जिससे ये खेती कर अपना अपनी जीविका चला सकें। वहीं इनकी युवा पीढ़ी पलायन कर दूसरे राज्यों में भी गए ताकि नौकरी कर सकें मगर नागरिकता की कमी के कारण इन्हें वहां भी परेशानी उठानी पड़ी।

वहीं साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए 3 महीने के अंदर इन जनजातियों को भारत की नागरिकता देने का आदेश जारी किया इसके बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और केंद्र में मंत्री किरण रिजिजू और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मिलकर एक बैठक की और जनजाति के लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान करने पर सहमति बनाई। हालांकि इनको जमीनी हक नहीं दिए जाने की भी शर्त रखी गयी। कुल मिलाकर अपने 50 साल के लंबे संघर्ष के बाद चकमा और हजोंग जनजाति आज भारत की नागरिकता के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहे है।

अकेला जाट योद्धा ‘राजा सूरजमल’ की कहानी

आपने इतिहास में बहुत सारे राजपूत योद्धाओं और राजाओं की कहानी सुनी होगी जो अपनी वीरता और देशप्रेम के लिए जाने गए। लेकिन राजा सूरजमल के बारे में इतनी बातें प्रचलित नहीं है जबकि वो एकमात्र ऐसे जाट राजा थे जिन्होंने अपनी वीरता के कारण राजपूत राजाओं में अपनी विशेष स्थान बनाएं। अभी रिलीज हुई बॉलीवुड पानीपत में विवादित कहानी को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। यह विवादित कहानी महाराजा सूरजमल की है। महाराजा सूरजमल के14 वे वंशज विश्वेंद्र सिंह का भी कहना है कि महाराज सूरजमल की कहानी को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है जिसके कारण जाट समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा है।

बता दें कि राजा सूरजमल का जन्म 13 फरवरी 1707 ईस्वी को हुआ था। उनके पिता का नाम राजा बदनसिंह था। राजा सूरजमल ने 1733 ईस्वी में भरतपुर नामक रियासत की स्थापना की थी। यह मौजूदा समय में राजस्थान का भरतपुर शहर कहलाता है। राजा सूरजमल इतने वीर और पराक्रमी थे कि अपने राजा बनने के कुछ ही समय के अंदर उन्होंने अपने देश की सीमाओं को दिल्ली और फिरोज शाह कोटला तक फैला लिया। राजा की इस बढ़ती हुई वीरता को देखकर उस समय दिल्ली का नवाब गाजीउद्दी इन्हे रोकने की कोशिश करने लगा।

इसके लिए उसने उस समय मराठों को भड़काना शुरू कर दिया। नवाब गाजीउद्दी के भड़काने में आकर मराठों ने राजा सूरजमल के ऊपर आक्रमण कर दिया और उनके किले को 6 महीने तक घेरे रखा। हालांकि इतिहास में यह कहा जाता है कि 6 महीने तक किले के बाहर बैठने के बाद भी मराठा भरतपुर पर कब्जा नहीं कर पाए और उन्हें उल्टे पांव लौटना पड़ा। राजा सूरजमल के द्वारा भरतपुर में लोहागढ़ किला का निर्माण कराया गया था जिसे अभेद किला भी कहा जाता है।

कहा जाता है कि यह किला मिट्टी से बना था लेकिन इसकी दीवारें इतनी चौड़ी और मजबूत हैं की तोप के गोले भी इस किले की दीवारों को तोड़ नहीं पाते थे। अंग्रेजों ने 13 बार भरतपुर के इस अभेद किले पर आक्रमण की लेकिन उन्हें एक बार भी सफलता हासिल नहीं हुई। जैसे कि हम सब जानते हैं मराठों ने मुगलों के भड़काने पर राजा सूरजमल पर आक्रमण कर दिया था बावजूद इसके राजा सूरजमल ने वक्त आने पर मराठा सैनिकों की सहायता की थी।

पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा सैनिक बुरी तरीके से घायल हो गए थे और उनके पास खाने-पीने का भी सामान नहीं बचा था। तब ऐसी हालत में राजा सूरजमल ने उनके साथ संधि कर ली और मराठों की भरपूर सहायता की। कहा तो यह भी जाता है कि राजा सूरजमल ने 6 महीने तक घायल मराठा सैनिकों को अपने यहां आश्रय दिया और उनकी सेवा की। 25 दिसंबर 1763 ईस्वी में हिंडन नदी के किनारे नवाब नजीबुद्दौला और राजा सूरजमल के बीच हुए युद्ध में महाराज सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए। राजस्थान में महाराजा सूरजमल को उनकी वीरता और दयालुता के लिए आज भी जाना जाता है।

इंदिरा नूई कैसे पहुंची कामयाबी की बुलंदी पर?

इंदिरा नूई एक ऐसा नाम है जिसको सुनने के बाद लोग महिलाओं के बारे में अपनी विचारधारा बदलने को मजबूर हो जाते हैं। हमारे देश में शुरू से मान्यता रही है कि औरतें घर संभालने के लिए होती हैं जबकि मर्द पैसा कमाने के लिए। ऐसे में इंदिरा नूई ने पेप्सिको जैसी कंपनी के सीईओ पद पर 12 साल नौकरी करके यह साबित कर दिया कि औरत चाहे तो घर संभाल सकती है और अगर चाहे तो किसी कंपनी को संभाल सकती है।

28 अक्टूबर 1955 में तमिलनाडु के चेन्नई में पैदा हुई इंदिरा मिडिल क्लास फैमिली में पली-बढ़ीं। इंदिरा के पिता एक बैंक कर्मी थे तथा उनकी माता हाउसवाइफ थीं। इंदिरा दो बहने थीं, इंदिरा और उनकी बहन चंद्रिका। इन दोनों का ही पालन-पोषण में इनकी मां का विशेष योगदान रहा है।

इंदिरा अपने इंटरव्यू में अक्सर बताते रहती हैं कि बचपन में ही उनकी मां उनसे पूछा करती थी कि वह आगे चलकर क्या करना चाहती हैं? मां के यह सवाल उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया करते थे उन्हें आगे चलकर कुछ ना कुछ तो करना ही है।

बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी रही इंदिरा को म्यूजिक बहुत पसंद था और वह एक म्यूजिक बैंड में गिटार बजाया करती थीं। इतना ही नहीं इंदिरा को क्रिकेट भी बहुत पसंद था वह अपने कॉलेज के गर्ल्स क्रिकेट टीम की सदस्य भी रह चुकी थी। बावजूद इसके इंदिरा ने अपने कैरियर को एक सही दिशा देने पर ज्यादा जोर दिया। इंदिरा कि बेसिक पढ़ाई ‘होली एंजेल्स एंग्लो इंडियन हायर सेकण्ड्री स्कूल’ में हुई इसके बाद इन्होने मद्रास क्रिस्चियन कॉलेज और उसके बाद सीधे IIM कलकत्ता मैं अपनी पढ़ाई जारी रखी।

इतना ही नहीं इंदिरा को जब यह महसूस हुआ कि वह बिजनेस की पढ़ाई और अच्छे से करना चाहती हैं तो उन्होंने सीधे अमेरिका का रुख किया और अमेरिका के ‘येल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट’ से पब्लिक एंड प्राइवेट मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल की। बता दें कि इंदिरा जब अमेरिका में पढ़ रही थी तो अपने खर्चे उठाने के लिए उन्होंने रिशेप्सनिष्ट तक की जॉब की। इसके बाद उन्होंने टूटल टेक्सटाइल, बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप, मोटोरोला, एबीबी(ABB) जैसी कंपनियों के साथ काम किया।

लेकिन 1994 में जब उन्हें पेप्सीको के सीईओ द्वारा कंपनी ज्वाइन करने का न्योता दिया गया तो वह तुरंत कंपनी को ज्वाइन कर लीं। यहां अपने कार्य और लगन से इंदिरा ने 1 साल के अंदर ही सीनियर वाइस प्रेसिडेंट का पद हासिल कर लिया। बताया जाता है कि साल 2006 में वह पेप्सीको के सीईओ बनीं और लगातार 12 सालों तक इस पद को संभालती रहीं।

इंदिरा अपने प्रोफेशनल कैरियर में जितनी सफल रहीं उतनी ही अपने पर्सनल रिलेशनशिप को भी उन्होंने मेंटेन किया। इंदिरा ने बिजनेस मैन राज के नूई से शादी की है और उनकी दो बेटियां हैं। उन्होंने सफलतापूर्वक अपनी गृहस्थी को भी संभाले हुए हैं। बता दें कि साल 2007 में इंदिरा नूई को भारत के प्रतिष्ठित ‘पद्म भूषण’ सम्मान से नवाजा गया है।

12 साल के बाल सेनानी ‘बाजी राउत’ का बलिदान

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे देश ने सदियों तक गुलामी सही है। कभी मुगलों के द्वारा तो क़भी अंग्रेजो के द्वारा तो कभी अपने ही देश के राजाओं के द्वारा। ऐसे ही एक राजतंत्र की गुलामी को झकझोर के रख देने वाले बाल क्रांतिकारी ‘बाजी राउत’ की कहानी हम लेकर आए हैं जिसमें एक लड़के ने मात् 12 साल की उम्र में अपने लोगों और अपने गांव के लिए लड़ते हुए अपने प्राणों को बलिदान कर दिया।

उड़ीसा के धेनकनाल में 1926 में जन्मे बाजी राउत की परवरिश उसने माता के द्वारा किया गया, क्योंकि जब वह बेहद छोटे थे तभी उनके पिता उन्हें अकेला छोड़ इस दुनिया से चले गए। बाजी राउत की परवरिश के लिए उनकी मां दूसरे गांव में जाकर लोगों के घरों में धान साफ और चावल साफ करने का काम करती थीं। बाजी राउत के गांव का राजा ‘शंकर प्रताप’ जिसके अत्याचारों से लोग त्रस्त हो चुके थे क्योंकि वह लोगों का बेहद शोषण करता था। जिस प्रकार हर समस्या के समाधान के लिए समाज में एक नेता उभरता है उसी प्रकार धेनकनाल के राजा शंकर प्रताप से लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए उसी गांव के बैष्णव चरण पट्टनायक आंदोलन का बिगुल बजा दिया।

इसके लिए उन्होंने ‘प्रजामंडल और वानर सेना संगठन’ की स्थापना किया। बता दें कि वानर सेना में सिर्फ बच्चे शामिल थे, जिनका मकसद अपने शहर और आसपास के लोगों की आजादी थी। अब संगठन का निर्माण तो हो चुका था लेकिन अधिक से अधिक लोगों को इस आंदोलन से जोड़ने के लिए पट्टनायक ने भारतीय रेल विभाग में पेंटर का काम करना शुरू कर दिया। आंदोलन की धार तेज करने के लिए पटनायक की मेहनत रंग ला रही थी और धेनकनाल सहित पड़ोस के सभी गांव विद्रोह में शामिल हो रहे थे। उधर राजा शंकर को इस आंदोलन की भनक लग गई और उसने आस-पड़ोस के सभी राजाओं से मदद मांगी। इतना ही नहीं राजा को शंकर प्रताप को अंग्रेजों का भी समर्थन मिलने लगा और पट्टनायक के आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने ढाई सौ सैनिकों की एक टुकड़ी भी राजा शंकर प्रताप के साथ लगा दी।

उधर राजा शंकर प्रताप तेजी से चट्टन पट्टनायक जो कि इस आंदोलन के मुखिया थे उनको ढूंढने के लिए अपने सैनिक लगा दिए। तभी उन्हें सूचना मिली किपट्टनायक ब्रह्माणी नदी के पास गांव में भागकर शरण लिए हैं। उन्हें पकड़ने के लिए राजा शंकर प्रताप ने सशस्त्र अंग्रेजों की टुकड़ी को उनके पीछे लगा दिया। हालांकि नदी के उस पार जाने के लिए उन्हें नाव की जरूरत थी और यहीं से शुरू होता है राउत की कहानी। अंग्रेजों को ब्राह्मणी नदी पार नहीं करने देने का जिम्मा बजी राउत को दिया गया था। बाजी राउत नदी के किनारे अपनी नाव में सो रहे थे तभी अंग्रेजों ने उन्हें नदी पारा करने के लिए कहा। अपनी मां और गांव वालों की दुर्दशा अपनी आंखों से देख चुके राउत ने एक झटके में अंग्रेजों को पार ले जाने से मन कर दिया। मात्र 12 साल के बच्चे का जोश देख अंग्रेज बौखलाहट से भर गए और वीर रावत के सर पर बंदूक के बट से प्रहार कर दिया। इस जोर के प्रहार से बाजी राउत जमीन पर गिर पड़े और छटपटाने लगे।

बावजूद इसके वह फिर खड़े हुए और जोर-जोर से चिल्लाते हुए उन्होंने अंग्रेजों को पार जाने से रोकने का प्रयास करने लगे। बाजी राउत इतना जोर से चिल्लाए कि गांव के सभी लोग इकट्ठा होने लगे, लोगों को इकट्ठा होते देख अंग्रेजों की हालत खराब हो गई। घबराहट में अंग्रेज सिपाहियों ने बाजी राउत तथा अपनी तरफ बढ़ रही भीड़ के ऊपर फायरिंग की जिसमें तीन चार लोगों की मौत हो गई। इस घटना में बालक बाजी राउत शहीद हो गए।

लोगों के आक्रोशित भीड़ को देख अंग्रेज वहां से भाग निकले। बाद में बस में पट्टनायक बाजी राउत सहित उस घटना में मरे सभी लोगों के पार्थिव शरीर को ट्रेन से कलकत्ता ले गए और वहां उनका अंतिम संस्कार किया गया। कहा जाता है कि उस समय 12 साल के शहीद सेनानी को देखने के लिए कलकत्ता में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।

भारत के पहले गुमनाम प्रधानमंत्री – मोहम्मद बकरतुल्ला खान

अंग्रेजों के जुल्मों और अत्याचारों से भारत को मुक्त कराने के लिए जितने भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए, जितने भी क्रांतिकारी हुए उनके बलिदान और त्याग की गाथा जितनी भी बार भी बताई जाये उतना ही कम है। महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का नाम तो हम सभी के जुबान पर अंकित है लेकिन एक ऐसा क्रांतिकारी जो इतिहास में गुमशुदा हो गया उनके बारे में हम आज बात करेंगे।

‘मोहम्मद बकरतुल्ला खान’ का नाम शायद ही आप लोगों ने सुना होगा क्योंकि हमारे देश में इन्हे उस तरह की प्रसिद्धि नहीं मिली जिस प्रकार अन्य लोगों को मिली। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बरकतुल्ला खान को भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने का भी गौरव प्राप्त है। बरकतुल्ला खान का जन्म 1854 ईसवी में मध्य प्रदेश के भोपाल में हुआ था। उन्हें अरबी, फारसी और अंग्रेजी शिक्षा की अच्छी समझ थी।

कहा जाता है कि यह जब इंग्लैंड पढ़ाई करने के लिए गए तब यही से इनके जीवन की बदलाव की शुरुआत हुई। इंग्लैंड में इनकी मुलाकात प्रवासी हिंदुस्तानी क्रांतिकारियों के लीडर श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुई। कहा जाता है कि बकरतुल्ला खान उनके कार्यों से बेहद प्रभावित हुए कि वह भी भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए पूरी तरीके से तैयार हो गए। चुकी उनकी लेखनी बहुत प्रखर थी इसीलिए उन्होंने कलम को अपना हथियार बनाया और लगातार क्रांतिकारी लेख लिखते रहे। उनके लेख में इतनी धार होती थी कि जल्दी ही वो लोगों की नजर में आ गए।

धीरे -धीरे बकरतुल्ला खान का इंग्लैंड में विरोध शुरू हो गया और उन्हें इंग्लैंड छोड़ना पड़ा। इसके बाद वह 1899 में वो अमेरिका पहुंच गए जहां ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ उनका विरोध जारी रहा। बकरतुल्ला खान यहीं नहीं रुके वह लगातार यात्राएं करते रहे और अमेरिका के बाद उन्होंने जापान  को  चुना।

यहां भी उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज बुलंद की। इतना ही नहीं वह लगातार जोर देते रहे कि हिंदू और सिख के तरह ही भारत के मुसलमान भी अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई में शामिल हों। बरकतुल्ला खान ने कनाडा मैक्सिको और अमेरिका में रह रहे प्रवासी हिंदुस्तानियों कि एक टीम बनाई जिसका नाम ‘गदर पार्टी’ रखा। गदर पार्टी की स्थापना 13 मार्च 1913 को किया गया। बकरतुल्ला खान का सपना था कि जल्दी ही ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़ कर स्वराज की स्थापना की जाए।

इसके लिए उन्होंने एक अस्थाई सरकार का निर्माण भी किया जिसमें चंपक रामन पिल्लई, भूपेंद्र नाथ दत्ता, राजा महेंद्र प्रताप और अब्दुल वहीद खान आदि लोगों का समर्थन इन्हें मिला। राजा महेंद्र प्रताप के साथ मिलकर बकरतुल्ला अफगानिस्तान पहुंच गए। वहां उन्होंने अफगानी सरकार के साथ मिलकर एक समझौता किया जिसमें कहा गया कि अफगानी सरकार अंग्रेजों  के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ दें इसके बदले अफगानिस्तान को बलूचिस्तान और पख्तूनी भाषा -भाषी क्षेत्र वापस कर दिया जाएगा।

इस अस्थाई सरकार में बकरतुल्ला खान को प्रधानमंत्री तथा राजा महेंद्र प्रताप को राष्ट्रपति घोषित किया गया था। हालांकि बकरतुल्ला खान का भारत को स्वतंत्र कराने का सपना पूरा नहीं हो सका और अपनी लंबी बीमारी के चलते 27 सितंबर 1927 को उन्होंने अमेरिका में ही अपने प्राण त्याग दिए। अपने वतन के लिए लागातार संघर्ष करने वाले मोहम्मद बकरतुल्ला खान के त्याग को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता।

जब ‘स्तन’ ढकने के लिए चुकानी पड़ती थी कीमत!

पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएं हमेशा से ही अपने अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष करती रही हैं। आज भले ही भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हर महिला को अपने पिता के संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया है लेकिन एक समय वह भी था जब महिलाओं को अपने तन ढकने के लिए भी कर देना पड़ता था।

ऐसे में समानता और अधिकार तो बहुत दूर की बात है जब अपना शरीर ढकने के लिए महिलाओं को कर देना पड़े तो उस समाज में आप महिलाओं की दुर्दशा का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं। यह लगभग 300 साल पहले की बात है जब दक्षिण भारत में यह ‘कर’ बेहद ही प्रचलित था। अपने स्थन को ढकने के बदले अपने राजा को कर देने की प्रणाली को ‘मुलाक्कारम’ कहा जाता था।

अगर कोई महिला कर देने में सक्षम नहीं है तो उसे अपने ऊपरी शरीर यानी कि स्तन को बिना ढके ही रहना पड़ता था। इस मानसिकता के पीछे सिर्फ यही वजह थी कि उच्च जातियों और नीची जातियों में अंतर स्थापित किया जा सके। क्योंकि उस समय में वस्त्र प्रतिष्ठा और सम्मान का विषय हुआ करता था।

वहीं इस कर की वजह से छोटी जाती के लोगों के ऊपर अतिरिक्त भार बढ़ने लगा और वो पहले गरीब बने फिर कर्जदार।
इस कर को वसूलने के लिए राजा के अधिकारी छोटी जाति के घरों में जाते और उनसे कर वसूल कर ले आते थे। इसमें भी बेहद शर्मनाक बात यह थी कि यह कर औरतों के स्तन के आकार के अनुसार लिया जाता था।

हालाँकि जबभी अत्याचार अपनी सीमा के बाहर जाता है तो कोई न कोई आंदोलनकारी पैदा होता ही है। इस कर प्रथा विरोध में भी ऐसा ही हुआ और एक ‘नंगेली’ नामक महिला ने अपना बलिदान दे कर लोगों को जगाने का कार्य किया। अल्पपुज़हा के चेर्थला गांव में रहने वाली नंगेली बेहद गरीब थी लेकिन वह तन ढकने के लिए राजा को कर दिया करती थी।

धीरे-धीरे नंगेली का परिवार भारी कर्ज में डूब गया जिससे व्यथित होकर नंगेली ने राजा को कर नहीं देने का निर्णय कर लिया। इस बार जब राजा के सैनिक कर लेने के लिए नंगेली के घर आए तब नंगेली ने केले के पत्ते बिछाकर उनके सामने अपने दोनों स्तन काट के रख दिए। इस भयंकर घटना के बाद राजा के सैनिक भाग खड़े हुए और नंगेली ने तड़प तड़प कर अपनी जान दे दी।

वहीं जब नंगेली के पति को इस बात का पता चला तब वह भी अपनी पत्नी की चिता के साथ जल कर मर गया। नंगेली तो नहीं रही लेकिन उसका यह बलिदान लोगों को अंदर तक झकझोर गया और ‘स्तन कर’ के खिलाफ लोग एकजुट होने लगे और आवाज उठाने लगे। यह साल 1803 की घटना थी और इसके बाद कहा जाता है कि 1813 आते -आते  इस व्यवस्था को बंद कर दिया गया। नंगेली के बलिदान के चलते उसके गांव को ‘मुलाचिपराम्भु’ के नाम से जाना जाता है।

‘मुलाचिपराम्भु’ का अर्थ है वह स्थान जहाँ पर स्तनों वाली महिला रहती थी।
कहा जाता है कि ‘पनायेरी नादर समुदाय’ की महिलाओं द्वारा भी स्तन कर का विरोध किया गया और इस विरोध को ‘चन्नर’ विद्रोह ने नाम से जाना गया।