रसभरी: दर्द भी दवा भी और खरपतवार भी-

-भारत में वैब सीरीज पर फिर उठी अंगुलियां, अश्लीलता का आरोप और सैंसरशिप की मांग-

                                                  -राजेंद्र कुमार 'राज'
        रसभरी एक ऐसी टीचर की कहानी है जो खूब जवान है और उनकी जवान अदाओं का असर सबके दिलो-दिमाग पर कैसे पड़ता है और उस दौरान क्या क्या होता है। कहानी और किरदार  इसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं। कंट्रोवर्सी होने के बाद इस पर अपने ब्यान में स्वरा भास्कर ने कहा है कि एक भी न्यूड सीन वैब सीरीज में नहीं है। दरअसल ये औरत की मासल देह, यौवन और अलमस्त जवानी को केंद्र में रख कर रची गई है। लक्ष्य हैं मर्द और उन्हें ललचाती ये कथा-कहानी पर रची गई वैसी ही एक वैब सीरीज है जैसी गंदी बात, हैल्लो मीनी आदि हैं। इसकी तह में वो रस है जिसे सब तलाशते हैं, लेकिन कबूलता कोई नहीं। दरअसल, इंसान का पूरा जीवन रस के वश में है। यहां हर कोई जीवन में रस खोज रहा है। तरह तरह से। हर कोशिश बस एक ही दिशा में हो रही है, एक ही लक्ष्य है । किसी तरह जीवन रस से भर जाए। फिर रसभरी की आलोचना क्यों? क्या एडल्ट कंटेंट की वजह से? या हमें लगता है इससे मानसिक प्रदुषण फैलेगा इस वजह से? या फिर ये भारतीय संस्कृति में अपनी तरह की पहली वैब सीरीज है इस लिए? या फिर एक तबका इसके पक्ष में आन खड़ा है और एक तबका इसके विरोध में है क्योंकि रसभरी में मुख्य भूमिका में कोई और नहीं राजनीति में गाहे-बगाहे अपने बयानों से तडक़ा-छौंका लगाने वाली स्वरा भास्कर हैं, तो क्या ये ही असली वजह है? शायद सब कारणों में से ये एक कारण है लेकिन यह मूल कारण नहीं है। वैब सीरीज को सेंसर बोर्ड के तहत लाया जाए और जैसे फिल्मों के लिए एक व्यवस्था है वैसी ही व्यवस्था वैब सीरीज के लिए भी हो। हाल ही में आई वैब सीरीज गंदी बात, भारतीय आर्मी और अब रसभरी के बाद ये चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ गई है।
 दरअसल वैब सीरीज पर जो कंटेंट आ रहा है उसे लेकर बहस अरसे से चल रही है। ये बात अलग है कि ये कभी गंदी बात रिलीज होते वक्त उठती है तो कभी ये आवाज सेक्रेड गेम्स समय उठी थी। अब एक बार फिर रसभरी के जरिये ये मामला चर्चा में है। अगर आप विशुद्ध तौर पर सिर्फ फिल्म, कहानी और कलाकार द्वारा निभाये किरदार की बात करेंगे तो फिर ऊपर उठे प्रश्नों के जवाब तलाशने की आपको जरूरत ही नहीं पड़ेगी। वैब सीरिज के रिव्यू को देखिए, ट्रेलर को पढिये-देखिये और अगर मन में रस फूटे तो रसभरी देखिये और न रस महसूस हो तो न देखिये। अब ये यहां पर जितना हां और न लिखना आसान दिखता है, उतना आसान है नहीं, क्योंकि भारत की जनसंख्या और इन दिनों यहां इंटरनेट की बेहद सस्ती दरों ने भारत को सभी के लिए बहती हुई गंगा बना दिया है। टिकटॉक का भारत से हटाया जाना और उसके हटने के बाद चीन सरकार के चिंता से भरे बयान ये बताते हैं कि ये ऐप भारत के लोगों से कितना मुनाफा कमा रहे होंगे। खैर इस पर फिर कभी बात होगी फिलहाल बात जारी रखते हैं आज के विषय वैब सीरीज के बारे में। तो रसभरी वैब सीरीज के ताजा एपीसोड ने फिर नई बहस को जन्म दे दिया है। ये इतफाक ही है कि पिछले दिनों जिस वैब सीरीज पर हल्ला हुआ था वो भी आल्ट बालाजी यानि एकता कपूर के प्रॉडकशन हाउस द्वारा एक फौजी के जीवन की कहानी पर निर्मित वैब सीरीज ही थी। जिसका नाम था भारतीय आर्मी। चारों तरफ आलोचना होने के बाद कई सीन्स को एकता कपूर प्रॉडकशन हाउस ने हटा दिया था। गंदी बात भी बाई चान्स आल्ट बाला जी प्रॉडकशन हाउस से निकली है। उसकी भी काफी आलोचना उसके अश्लील कंटेंट के लिए हुई थी। अभी भी हो रही है। 

एक तर्क ये दिया जा रहा है कि कोई जबरदस्ती थोड़ी दिखाता है । जिसकी मर्जी हो वो देखे और जिसकी मर्जी न हो वो न देखे । सोचने वाली बात लेकिन ये है कि क्या ये तर्क संगत है? शायद नहीं, क्योंकि भारत में मौजूद युवा तक जब आपका ट्रेलर सनसनी से भरपूर गर्मागर्म सीन्स और दो-अर्थी संवाद में लिपटे सीधे बैड रूम की भाषा बोलता हुआ पहुंचता है, तो युवा पीढ़ी सन्न रह जाती है कि अरे इतना मसाला ! और सारा कंटेंट एडल्ट होने के बावजूद युवाओं, किशारों को ऐसी वैब सीरीज को सबस्क्राईब करने को मजबूर कर देता है। जब ये हो रहा होता है और हम सब ये जानते हों कि ऐसा ही हो रहा है तो ये तर्क कि जिसकी मर्जी देखे जिसकी मर्जी न देखे, ये सब छलावा लगता है। ऐसा कोई मैकेनिज्म फिलहाल भारत में क्या दुनिया में कहीं नहीं है, जिससे कि ये जाना जा सके कि देखने वाला सही में एडल्ट है या नहीं। हां, मोबाईल कनैक्शन एडल्ट के नाम होता जरूर है, लेकिन घरों में बच्चे भी उसका प्रयोग करते हैं। वाई-फाई भी घरों में सबको उपलब्ध होता है। तो फिर सवाल उठता है, हल क्या है?
यूट्यूब पर हजारों की संख्या में कुछ लोग, कुछ प्रॉडकशन हाउस अपना कारोबार ऐसे ही कंटेंट के जरिये कर रहे हैं। वो भी धडल्ले से। तो सिर्फ आल्ट बालाजी या एकता कपूर को दोष देना वाजिब नहीं है शायद। ऑन लाईन प्लेटफार्म वो चाहे यूट्यूब हो या फिर ऐप्स उन पर ऐसी रसभरी कथा-कहानियों की इन दिनों एक बाढ़ देखने को मिल रही है। जहां मन-रस, काम-रस और यौवन-रस को ध्यान में रखते हुए अपने आप में अलग ही तरह का एक तिलिस्म रचा जा रहा है । लोग इसके दिवाने हो रहे हैं। रसभरी तो एक नाम है, वैसे ही तिलिस्म से जाने कितने ही वैब सीरीज, शार्ट फिल्म दर्शकों को रिझाने में लगे हैं । रोज ही नई धमक के साथ सैंकड़ों कहानियां यूट्यूब पर अपलोड की जा रही हैं। बिना किसी सेंसरशिप के और बिना किसी चैक के। यूट्यूब पर आपको रसभरी अलग अलग नाम से हिंदी ही नहीं स्थानीय भाषाओं में भी मनोरंजन के लिए हाजिर मिलेगी। अब प्रश्न ये किया जा रहा है कि ये समस्या है, लेकिन बचाव पक्ष की दलील है कि ये समस्या है ही नहीं। ये आप की पसंद और न पसंद की बात है। चलिए देखते हैं कि देश में इस नई बहस का मौजूदा रूप क्या है।
भारतीय आर्मी वैब सीरीज की अलोचना करते हुए राष्ट्रीय सेवक संघ और उसी की शाखा संस्कार भारती जोकि हिंदू संस्कृति के विकास-विस्तार के लिए कार्य करती है, ने भारत में दिखाई जा रही वैब सीरीज भारतीय आर्मी को भारतीय मूल्यों और परंपरओं के खिलाफ, हिंदुओं को बदनाम करने वाली और धार्मिक परंपरओं को ठेस पहुंचाने वाली करार दिया। ये टिप्पणी फौरी तौर पर भारतीय आर्मी वैब सीरीज के खिलाफ की गई और यही नहीं मध्य प्रदेश में एक एफआईआर भी दर्ज करा दी गई । आरएसएस और संस्कार भारती चाहते हैं कि केंद्र सरकार एक कानून ले कर आए और फिल्म की तरह वैब सीरीज को रिलीज करने से पहले सैंसर बोर्ड का सामना करना पड़े। इसी मांग के साथ संस्कार भारती ने एक रेज्यूलेशन एवं मोमरेंडम पारित किया । इस प्रस्ताव में कहा गया है कि इन वैब सीरीज में हिंदू धर्म को कलंकित करने वाले और हिंदू मूल्यों को अपराधी बताने वाले दृश्यों को भरपूर मात्रा में दिखाया गया है। वैब सीरीज में काम करने वाले कलाकारों को, समाज को, खासतौर से युवाओं को सही दिशा में ले कर जाना चाहिए। यहां कई लोग हैं जो ऐसी वैब सीरीज बना रहे हैं जो हमारे समाज के लिए किसी भी प्रकार से सही नहीं हैं। ये कानून का काम है कि वो ऐसे लोगों को ऐसी सामग्री प्रचारित प्रसारित करने से रोके।
संस्कार भारती के राष्ट्रीय महासचिव अमीर चंद ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वे वैब सीरीज पर नियंत्रण के लिए तत्काल कानून ले कर आएं। ब्यान में उन्होंने वैब सीरीज को भारतीय पंरपराओं का अपमान करने वाली और नैतिक मूल्यों की गिरावट का समर्थन करने वाली वैब सीरीज करार दिया और मांग की है कि वैब सीरीज के लिए सेंसरशिप लागू की जानी चाहिए । जैसे फिल्मों को सेंसर बोर्ड से अनुमति लेनी होती है वैसी ही सिस्टम वैब सीरीज के लिए भी बने।
अकेले आरएसएस या संस्कार भारती ये मांग कर रहे हों ऐसा नहीं है। भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने भी वैब सीरीज के लिए एक व्यवस्था बनाने की मांग की है। वे कहते हैं कि आज के समय में वैब सीरीज में सबसे ज्यादा अश्लीलता परोसी जा रही है। मैं तो कहता हूं ये सेमी पोर्न नहीं, पोर्न की तरह कंटेंट दिखा रहे हैं। यदि कोई बड़ी घटना होती है तो कहा जाता है फिल्म देखकर आज की युवा जनरेशन बिगड़ रही है। आज हर यूथ के हाथ में मोबाइल है। वे वैब सीरीज से लेकर सोशल साइट्स पर मौजूद अश्लील कंटेंट देख सकते है। सरकार की इच्छा शक्ति ही नहीं है कि वे इस पर सख्ती से रोक लगा सकें। सिर्फ फिल्मों को दोष देने से क्या होगा। फिल्म तो छोडि़ए उसके ट्रैलर या दस सेकंड के एड तक को सेंसर किया जाता है। क्या सारी सख्ती सिर्फ फिल्मों के लिए ही होगी। सरकार को डबल स्टैंडर्ड पॉलिसी छोडऩी ही होगी। उन्होंने कहा कि अक्सर डायरेक्टर बचाव में ये कहते हैं कि कंटेंट को सेंसरशिप के दायरे में मत लाइये, दर्शक के पास रिजेक्ट का ऑप्शन है। मेरा मानना है कि रिजेक्ट का ऑप्शन होने का मतलब ये नहीं कि कुछ भी परोस दिया जाए। टीवी में भी यही हालत है। टीवी सीरियल्स में एक महिला की तीन-तीन बार शादी दिखाई जाती है। टीवी सीरियल को लेकर भी उतनी सख्ती नहीं है। सभी वैब सीरीज पर सेंसरशिप के हक में नहीं हैं। अमोल पालेकर तो फिल्मों से भी सेंसर बोर्ड की दखलअंदाजी हटवाना चाहते हैं। उनका कहना है कि सेंसर बोर्ड होना ही नहीं चाहिए। गोलमाल से मशहूर हुए अभिनेता आमोल पालेकर के अपने तर्क हैं। वे कहते हैं कि सेंसर होने से कलाकार जो कहना चाहता है वो कह नहीं पाता। सेंसर बोर्ड का कोई औचित्य नहीं है। इसे खत्म कर देना चाहिए। वैब सीरीज और उसके कंटेंट पर उठ रहे सवालों के कई जवाब एक ऑनलाईन पटीशन के जरिये देने की कोशिश की गई है। इस ऑनलाईन पटीशन में कहा गया है कि वैब सीरीज पर सैंसरशिप लगाने का कोई मतलब नहीं बनता है। कई दूसरे देशों ने इंटरनेट के जरिये प्रसारित होने वाली ऐसी ही सामग्री को रोकने की कोशिश की लेकिन वे विफल रहे हैं। यदि भारत में ऐसा होता है तो ये क्रिएटिविटी की मौत होगी।
बहरहाल अगर दर्शक के नजरिये से देखें, तो उसे सिर्फ मनोरंजन चाहिए। भागदौड़ और तनाव भरी इस जिंदगी में वो कुछ पल अपने लिए चाहता है। उसे कुछ रस चाहिए। उसके लिए वो वही देखेगा जहां उसे वांछित रस मिलेगा। शांति, सुकून मिलेगा। मनोरंजन मिलेगा। मनोरंजन का मतलब ही मन का रंजन है। मन को किसी ऐसी चीज में लगाना जहां मन का मनोरंजन हो। देखिए दर्शक एक आम आदमी है वो न तो पहलाज निहलानी है और न ही आमोल पालेकर। उसे मतलब नहीं किसी आनलाईन पटीशन से और उसे नहीं पता कुछ, और उसे कुछ ज्यादा लेना देना भी नहीं उन ग्रंथियों से जो आदमी की सोच को जलेबी बना देती हैं।
सीधा सादा-तबीयत इंसान जीवन में रस चाहता है। यहां रसभरी पौधे का जिक्र जरूरी है। भारत में एक पौधा पाया जाता है जिसका नाम रसभरी है। ये रसभरी नाम भी उसी पौधे से चलन में आया है। रसभरी का पौधा सेहत के लिए औषधिय गुणों की खान बताया गया है। मध्य प्रदेश, यूपी, बिहार, छतीसगढ़, पूर्व, उत्तर भारत सहित मध्य और दक्षिण में रसभरी के गुणों की वजह से उसे सब चाहते हैं। कहते हैं रसभरी से भूख और पाचन शक्ति बढ़ते है। लीवर भी अच्छे से काम करता है। त्वचा के रोग दूर होते हैं। हिचकी और सांस फूलने पर भी रसभरी फायदा करती है, लेकिन ये रसभरी तब आफत बन जाती है जब ये खरपतवार की तरह उगने लगती है। यही वो स्थिति है जो आज दर्शक के सामने रसभरी और ऐसी ही अन्य वैब सीरीज की शक्ल में सामने आन खड़ी हुई है। इसी स्थिति का फायदा रसभरी के विरोधी और पक्षधर उठाने में लगे हैं। फिलहाल वैब सीरीज पर कोई कानूनी सैंसरशिप जैसा लागू नहीं है। मांग जरूर उठ रही है। आने वाले दिन तय करेंगे की कानून बनता है या फिर फ्रीडम ऑफ स्पीच और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन यूं हीं गंदीबात को रसभरी में लपेट कर आप तक परोसता रहेगा। रसभरी दर्द भी है और दवा भी है। यह अगर खरपतवार हुई तो जीवन खरपतवार हो सकती है।
स्वरा भास्कर के ट्वीटर हैंडल पर जो ट्वीट आजकल पिन्नड ट्वीट है उसमें वो कहती हैं कि दोस्तों! रसभरी के जादू से कोई नहीं बच सका। आजमा के देंखें। फिल्म में उनका जो एक किरदार है उसका एक खास डायलॉग है कि आओ थोडा मुंह का स्वाद बदल लें। लेकिन अब हमें ये तय करना है कि हमें उसे कितना बदलना है जब तक ये तय हो आप जिंदगी का रस लें।

       -फोटो क्रेडिट एवं कैप्शन -    


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1 फोटो क्रेडिट : स्वरा भास्कर टवीटर हैंडल
फोटो कैप्शन : रसभरी वैब सीरीज स्वरा भास्कर
1 A फोटो क्रेडिट : स्वरा भास्कर टवीटर हैंडल
फोटो कैप्शन : रसभरी वैब सीरीज स्वरा भास्कर
1 B फोटो क्रेडिट : स्वरा भास्कर टवीटर हैंडल
फोटो कैप्शन : रसभरी वैब सीरीज स्वरा भास्कर
2 फोटो क्रेडिट : विकीपिडया
फोटो कैप्शन : रसभरी का पौधा
3 फोटो क्रेडिट : फलीकर
फोटो कैप्शन : रसभरी फल
4 फोटो क्रेडिट : विन्नी पेग फ्री प्रेस
फोटो कैप्शन : रसभरी फल
5 फोटो क्रेडिट : स्वरा भास्कर टवीटर हैंडल
फोटो कैप्शन: स्वरा भास्कर के टवीटर हैंडल पर पिन्नड टवीट

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